




डॉ. एमपी शर्मा.
गणेश, एक ऐसा नाम जो भारतीय जनमानस की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का अमिट प्रतीक है। उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है, यानी संकटों को हरने वाले। शुभ कार्यों के प्रारंभ में सबसे पहले जिनका स्मरण और पूजन होता है, वे हैं श्री गणेश। विवाह हो या नया व्यवसाय, गृह प्रवेश हो या परीक्षा। हर बार पहला निमंत्रण गणपति बप्पा को ही जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि गणेश जी के जीवन-दर्शन को आत्मसात करने का प्रतीक है।
गणेश जी के हर अंग में एक गूढ़ अर्थ छिपा है। गजमुख, क्योंकि उनका हाथी जैसा मुख बुद्धि, बल और सौम्यता का द्योतक है। लंबोदर, क्योंकि बड़ा पेट हर अनुभव और ज्ञान को आत्मसात करने की शक्ति का प्रतीक है। एकदंत यानी एक ही दांत, यह बताता है कि उन्होंने अहंकार और सुविधा का त्याग किया। मूषक वाहन यानी एक छोटा सा चूहा उनका वाहन है, जो बताता है कि सबसे छोटे साधन से भी महान लक्ष्य साधे जा सकते हैं। यह विनम्रता और आत्मसंयम का भी प्रतीक है।
गणेश जन्म: आज्ञा, भक्ति और कर्तव्य का संदेश
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने उबटन से एक बालक को बनाया और उसे दरवाजे पर बैठाकर आज्ञा दी कि किसी को अंदर न आने देना। उसी समय भगवान शिव आए और गणेश ने उन्हें रोक दिया। क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया। जब पार्वती ने इस पर शोक व्यक्त किया, तब शिवजी ने हाथी का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया और देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य बना दिया। यह कथा सिर्फ धार्मिक कथा नहीं, बल्कि आज्ञाकारिता, भक्ति और कर्तव्यपरायणता का गहन उदाहरण है। गणेश ने अपने प्राणों की आहुति तक दे दी, पर माता की आज्ञा से विचलित नहीं हुए।

माता-पिता की सेवा: गणेश से सीखने योग्य मूल्य
एक अन्य प्रसंग में जब देवताओं में यह प्रतियोगिता हुई कि जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, वह श्रेष्ठ कहलाएगा। सभी देवता अपने तेज वाहन पर निकल पड़े। लेकिन गणेश जी ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) की तीन बार परिक्रमा कर कहा, 6मेरे लिए माता-पिता ही समस्त संसार हैं।’ गणेश की यह बात न केवल प्रतियोगिता में उन्हें विजयी बनाती है, बल्कि माता-पिता के सम्मान और सेवा का ऐसा आदर्श प्रस्तुत करती है, जो आज के भौतिकवादी युग में विशेष प्रासंगिक है।
गणपति के नाम और उनके अर्थ
गणेश जी को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है और हर नाम का विशेष अर्थ होता है। मसलन, विनायक यानी नेतृत्व करने वाले। विघ्नहर्ता यानी बाधाओं को दूर करने वाले। सिद्धिविनायक यानी सफलता और सिद्धि देने वाले। गणपति अर्थात गणों (लोकों या सेवकों) के स्वामी। बप्पा यानी महाराष्ट्र में उन्हें स्नेह से दिया गया प्रिय नाम।

गणेश चतुर्थी: श्रद्धा और सामाजिकता का पर्व
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन सुंदर मूर्तियाँ घरों और पंडालों में विराजित की जाती हैं। मोदक, लड्डू, दूर्वा जैसे भोग अर्पित किए जाते हैं। पूजा के पश्चात गणेश विसर्जन होता है, जो 1.5 दिन से लेकर 11 दिन तक चलता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामूहिकता, संस्कृति और उल्लास का प्रतीक है।
महाराष्ट्र में विशेष महत्व
गणेश चतुर्थी को महाराष्ट्र में विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसे लोक-आस्था के रूप में स्थापित किया, जबकि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे जनजागरण और स्वतंत्रता संग्राम का मंच बनाया। आज भी महाराष्ट्र में हजारों गणपति पंडाल सजते हैं। वहाँ भजन-कीर्तन, झांकियाँ, नाट्य प्रस्तुतियाँ और सामाजिक सेवाएँ होती हैं, जो समाज को जोड़ने और जागरूक करने का काम करती हैं।

गणेश से क्या सीखें हम?
आज के दौर में जब मानव जीवन भागदौड़, भ्रम और तनाव से भर गया है, गणेश जी के गुण और दृष्टिकोण प्रेरणा बन सकते हैं। आज्ञाकारिता यानी माता की आज्ञा का पालन करते हुए प्राण भी दे देना। ज्ञान और विवेक यानी बुद्धि और व्यवहार में संतुलन। विनम्रता यानी महान होने पर भी छोटा बनकर रहना। प्रारंभ का महत्व अर्थात हर कार्य की सशक्त शुरुआत और संकल्प।
केवल देवता नहीं, एक जीवन-दर्शन
गणेश जी की पूजा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक गूढ़ जीवन-दर्शन का मार्ग है। वे हमें सिखाते हैं, विवेक से सोचो, समर्पण से काम करो, माता-पिता का सम्मान करो और हर आरंभ को पूरी तैयारी से करो। उनकी पूजा लड्डू और मोदक तक सीमित न रहे, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना ही उनकी सच्ची भक्ति है। गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया! यह उद्घोष केवल एक जयघोष नहीं, बल्कि आत्मा की उस पुकार का प्रतीक है, जो समर्पण, विवेक, श्रद्धा और संस्कारों की ओर लौटने का संदेश देती है।
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




