






भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में पुलिस महकमे के शीर्ष पद पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। एक जुलाई से नए डीजीपी को चार्ज संभालना है, लेकिन अंतिम निर्णय अब तक लंबित है। केंद्र से मिली मंजूरी के बावजूद राज्य सरकार की ओर से अंतिम मुहर न लगने के पीछे कई प्रशासनिक और राजनीतिक पहलू जुड़ गए हैं। सवाल उठता है कि आखिर जब प्रक्रिया तय है, नाम तय हैं, तो फिर निर्णय में देरी क्यों हो रही है? डीजीपी की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार ने वरिष्ठता के आधार पर तीन आईपीएस अधिकारियों, राजीव शर्मा (1990 बैच), राजेश निर्वाण (1992 बैच) और संजय अग्रवाल (1992 बैच के नामों का पैनल संघ लोक सेवा आयोग को भेजा था। यूपीएससी ने इस पैनल को अनुमोदित कर राज्य को लौटा दिया है। अब अंतिम फैसला मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को करना है।
सूत्रों का कहना है कि भाजपा सरकार अभी डेढ़ साल की है। ऐसे में वह कोई भी नियुक्ति राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से सोच-समझकर करना चाहती है। डीजीपी पद केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सरकार चाहती है कि नया डीजीपी न केवल कानून-व्यवस्था में सक्षम हो, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी ’विश्वसनीय’ हो। तीन नामों में से दो अधिकारी राजीव शर्मा और राजेश निर्वाण केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। जबकि संजय अग्रवाल वर्तमान में राजस्थान में इंटेलिजेंस डीजी के रूप में कार्यरत हैं। यदि राज्य सरकार बाहर से किसी को बुलाकर डीजीपी बनाती है, तो यह संदेश जाएगा कि राजस्थान में कार्यरत अधिकारियों में भरोसा नहीं है। वहीं, यदि राज्य में कार्यरत अधिकारी को चुना जाता है, तो यह एक स्वाभाविक चयन माना जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि राजीव शर्मा सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन लंबे समय से केंद्र में हैं। वहीं, संजय अग्रवाल ने राज्य में ग्राउंड लेवल पर लंबा समय बिताया है और वर्तमान में इंटेलिजेंस महकमे में सक्रिय हैं। ऐसे में सरकार को तय करना है कि वह “कागजी वरिष्ठता” को तरजीह दे या “जमीनी अनुभव और तत्परता” को।
सूत्रों के अनुसार, गृह विभाग और कार्मिक विभाग के बीच कुछ बिंदुओं पर मतभेद हैं। एक विभाग वरिष्ठता के आधार पर चयन को तवज्जो दे रहा है, जबकि दूसरा विभाग राज्य में वर्तमान भूमिका और प्रभावशीलता के आधार पर निर्णय की सिफारिश कर रहा है।
हालिया डीजीपी रवि प्रकाश महरडा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के प्रमुख थे और डीजीपी पद पर अस्थायी रूप से नियुक्त किए गए थे। चूंकि वे आज यानी 30 जून को रिटायर हो रहे हैं, ऐसे में नया डीजीपी नियुक्त करने का दबाव है। पहले यह कयास थे कि मेहरडा का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है, लेकिन यूपीएससी पैनल आ जाने के बाद यह संभावना खत्म हो गई है।
जानकारों का कहना है कि प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार केस (2006) के आदेशों के अनुसार डीजीपी चयन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। इसके बावजूद, अंतिम चयन में राज्य सरकार को रणनीतिक छूट प्राप्त होती है। राज्य सरकार तीन नामों में से किसी को भी चुन सकती है, और इस चयन में प्रशासनिक दक्षता से अधिक राजनीतिक संदेश और प्रशासनिक नियंत्रण प्रमुख कारक बन जाते हैं।
क्या हो सकता है अंतिम चयन?
राजीव शर्मा : वरिष्ठता में सबसे आगे, लेकिन राज्य से लंबे समय से दूर। यदि सरकार अनुभव और दिल्ली से बेहतर समन्वय को प्राथमिकता दे तो इनका चयन हो सकता है।
राजेश निर्वाण : अपेक्षाकृत शांत प्रोफ़ाइल, लेकिन तकनीकी और खुफिया मामलों में दक्ष। कम चर्चित लेकिन संतुलित विकल्प।
संजय अग्रवाल : फिलहाल राजस्थान में तैनात और जमीनी हकीकत से वाकिफ। भाजपा सरकार के साथ बेहतर सामंजस्य की संभावना।
राजस्थान में डीजीपी चयन की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, लेकिन फैसला राजनीतिक संतुलन, प्रशासनिक दक्षता और विश्वास की त्रयी में उलझा हुआ प्रतीत होता है। अब यह देखना रोचक होगा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस त्रिकोण में से किस दिशा में निर्णायक कदम उठाते हैं। एक जुलाई को प्रदेश को नया डीजीपी मिलेगा, लेकिन तब तक यह चयन राजस्थान की प्रशासनिक और राजनीतिक हलचलों का केंद्र बना रहेगा।




