




डॉ. एमपी शर्मा
राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में सड़कों पर एक खतरनाक प्रवृत्ति तेज़ी से पनप रही है, ओवरलोडेड वाहन, खासकर तूड़ी (पराली/भूसा) से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां। ये वाहन महज़ नियमों की धज्जियां नहीं उड़ाते, बल्कि सीधे-सीधे आम नागरिकों की जान पर बन आते हैं। हाल ही में जयपुर रोड पर हुए दर्दनाक हादसे में बाप-बेटे सहित छह लोगों की अकाल मृत्यु ने इस संकट की भयावहता को फिर उजागर कर दिया। यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि रोज़मर्रा का सिलसिला है, जो हर दिन किसी न किसी परिवार को उजाड़ रहा है और हम हैं कि इसे ‘रूटीन’ मानकर आगे बढ़ जाते हैं।
तूड़ी से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां अक्सर क्षमता से कई गुना अधिक लदी होती हैं। नतीजा, पूरी सड़क घिर जाती है, पीछे से आने वाले वाहनों को कुछ दिखता नहीं, संतुलन बिगड़ते ही पलटने का खतरा, और रात में बिना रिफ्लेक्टर या रोशनी के संचालन। ये वाहन ‘चलती दीवार’ बन जाते हैं, जिनसे टकराव अक्सर जानलेवा साबित होता है। सवाल यह नहीं कि हादसा होगा या नहीं, सवाल यह है कि कब।
दुर्घटनाओं के मुख्य कारण
क्षमता से कई गुना अधिक लोड। सुरक्षा उपायों की अनदेखी, न इंडिकेटर, न रिफ्लेक्टर। ट्रैफिक नियमों की खुली अवहेलना, मानो नियम किसी और के लिए हों। रात में बिना रोशनी के संचालन, सीधा न्योता हादसे को। अनट्रेंड या नाबालिग चालक, जिम्मेदारी का घोर अभाव।
जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है, आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या यह प्रशासन की कर्तव्यहीनता है? क्या यह भ्रष्टाचार है, जहाँ नियम पैसे के बदले नजरअंदाज होते हैं? या राजनीतिक दबाव, जिसके चलते कार्रवाई ठंडी पड़ जाती है? सच शायद इन सबके बीच कहीं है। पर नतीजा एक, निर्दाेष लोगों की मौत।
‘किसान’ के नाम पर अवैध व्यापार
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि कई लोग ‘किसान’ का नाम लेकर पंजाब और राजस्थान से तूड़ी का अवैध व्यापार करते हैं। भारी मुनाफे के लालच में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां ओवरलोड की जाती हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि असली किसानों की साख पर भी दाग है। परंपरा और मेहनत की आड़ में लालचकृयह सौदा समाज को महंगा पड़ रहा है।
सबसे दुखद यह कि कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ ‘व्यापार’ है, प्रशासन के लिए ‘एक और फाइल’, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए जीवन भर का दर्द। क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि कुछ रुपये के लिए किसी की जान की कीमत भूल जाएँ?
अब क्या किया जाए?
सख्त और निरंतर कार्रवाई। भारी जुर्माना, बार-बार उल्लंघन पर वाहन जब्ती। टेक्नोलॉजी का उपयोग, ड्रोन निगरानी, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट पहचान। स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही, हादसे पर जिम्मेदारी तय, ‘नो एक्शन’ पर दंड। जनजागरूकता, ग्रामीण क्षेत्रों, स्कूलों और पंचायतों में अभियान। वैकल्पिक परिवहन, तूड़ी के लिए सुरक्षित, मानकीकृत वाहन। सरकार अकेली कुछ नहीं कर सकती। समाज को भी आगे आना होगा, ऐसे वाहनों का बहिष्कार, प्रशासन को सूचना, और खुद नियमों का पालन। पुराने ज़माने की एक सादी सीख हैकृरास्ता सबका है, जिम्मेदारी भी।
हर हादसे के बाद कुछ दिन चर्चा होती है, फिर सब सामान्य, जब तक अगला हादसा न हो। सवाल वही है, क्या हम किसी और की मौत का इंतजार कर रहे हैं? जब तक सख्त कार्रवाई, ईमानदार प्रशासन और जागरूक समाज एक साथ नहीं आएंगे, तब तक ये ओवरलोडेड ट्रॉलियां सड़कों पर चलती हुई मौत बनी रहेंगी। अब समय है, लाभ से पहले जीवन को प्राथमिकता देने का।
-लेखक जाने-माने सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं






