


डॉ. एमपी शर्मा.
आज का युग विज्ञान, तकनीक और चिकित्सा में अभूतपूर्व प्रगति का युग माना जाता है। जिन बीमारियों से कभी मानवता थर्राती थी, उन्हें हमने दवाओं के दम पर काबू में किया। लेकिन इसी सफलता की छाया में एक नई, खामोश और बेहद खतरनाक चुनौती जन्म ले चुकी है, एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस, यानी दवाओं के प्रति रोगाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस विषय पर चिंता व्यक्त कर पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा है। यह चेतावनी साधारण नहीं है, क्योंकि यह संकट अब केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ चुका है।

क्या है एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस?
सरल शब्दों में समझें तो एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस वह स्थिति है, जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी उन दवाओं के असर से बच निकलते हैं, जिनसे उन्हें खत्म होना चाहिए। यानी दवा मौजूद है, डॉक्टर भी वही दवा लिख रहे हैं, लेकिन रोगाणु उस पर हँस रहे हैं। नतीजा यह होता है कि साधारण संक्रमण भी गंभीर रूप ले लेता है और इलाज कठिन, लंबा तथा महँगा हो जाता है।

भयावह होते आँकड़े
यह समस्या कल्पना नहीं, बल्कि ठोस सच्चाई है। वैश्विक स्तर पर वर्ष 2019 में लगभग 12 लाख 70 हजार लोगों की मौत सीधे तौर पर एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस के कारण हुई। करीब 49 लाख से अधिक मौतों में इसकी भूमिका रही। यह संख्या एचआईवी, एड्स और मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली कुल मौतों से भी अधिक है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक हर साल एक करोड़ लोगों की जान इस खामोश महामारी के कारण जा सकती है।
भारत की स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत उन देशों में शामिल है, जहाँ एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग सबसे अधिक और सबसे लापरवाही से होता है। वर्ष 2019 में भारत में अनुमानित तीन से दस लाख मौतें एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस से जुड़ी थीं। कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि 80 प्रतिशत से अधिक मरीजों में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए, जिन पर सामान्य दवाएँ असर नहीं करतीं। यदि यही रुझान जारी रहा, तो 2050 तक भारत में लगभग 20 लाख मौतें हर साल इस कारण हो सकती हैं।

इस संकट के पीछे के कारण
एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस का सबसे बड़ा कारण दवाओं का अंधाधुंध उपयोग है। हमारे समाज में बुखार, दर्द या मामूली संक्रमण होते ही एंटीबायोटिक लेने की प्रवृत्ति आम हो गई है। सर्दी-जुकाम, वायरल बुखार, फ्लू, डेंगू या चिकनगुनिया जैसी बीमारियाँ वायरस से होती हैं, जिनमें एंटीबायोटिक का कोई काम नहीं। फिर भी लोग इन्हें ‘तेज इलाज’ समझकर खाते हैं।
बिना पर्ची दवाओं की उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बनाती है। फार्मेसी से बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक मिल जाना हमारे देश की एक कड़वी सच्चाई है। इसके अलावा बिना डिग्री वाले चिकित्सकों द्वारा गलत दवाएँ लिखना, और कभी-कभी योग्य डॉक्टरों द्वारा भी मरीज के दबाव या समय की कमी में अनावश्यक एंटीबायोटिक देना, स्थिति को और बिगाड़ देता है। अधूरा कोर्स करना, गलत खुराक लेना और बची हुई दवा को दोबारा इस्तेमाल करना भी रेज़िस्टेंस को बढ़ावा देता है।

खतरे की घंटी
एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। साधारण संक्रमण जानलेवा बन सकते हैं। ऑपरेशन, कैंसर का इलाज, अंग प्रत्यारोपण और नवजात शिशुओं का उपचार, उच्च जोखिम वाले हो जाते हैं। इलाज लंबा चलता है, अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि बढ़ती है और महंगी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, जिसका सबसे बड़ा बोझ गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।
समाधान हमारे हाथ में
यह संकट जितना बड़ा है, उसका समाधान उतना ही सीधा भी है।यदि हम जिम्मेदारी दिखाएँ। आम जनता को चाहिए कि बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक न लें, वायरल बीमारियों में इसकी मांग न करें और दवा का पूरा कोर्स जरूर करें। डॉक्टरों की भूमिका भी बेहद अहम है। उन्हें केवल आवश्यकता होने पर ही दवाएँ लिखनी चाहिए और मरीजों को सही जानकारी देनी चाहिए। सरकार और व्यवस्था को बिना पर्ची दवाओं की बिक्री पर सख्ती, बिना डिग्री के प्रैक्टिस पर नियंत्रण और व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने होंगे। एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस एक धीमी, लेकिन विनाशकारी महामारी है। ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री का संदेश हमें चेतावनी देता है कि यदि आज हमने समझदारी नहीं दिखाई, तो कल दवाइयाँ भी असहाय हो जाएँगी। एंटीबायोटिक सोच-समझकर लें, क्योंकि अगली पीढ़ी का स्वास्थ्य और भविष्य इसी समझदारी पर टिका है।
-लेखक जाने-माने सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



