


सुचेता जैन.
हर साल जैसे ही 31 दिसंबर की रात आती है, सोशल मीडिया अचानक बहुत ‘ज्ञानवान’ हो जाता है। इंस्टाग्राम पर रील्स, व्हाट्सऐप पर स्टेटस और यूट्यूब पर मोटिवेशनल वीडियो सब एक ही बात दोहराते हैं, ‘न्यू ईयर न्यू मी’। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में हम नए हो जाते हैं? या सिर्फ कैलेंडर का पन्ना पलटता है, और हम वही रहते हैं, थोड़े ज्यादा थके हुए, थोड़े ज्यादा उलझे हुए?

आज का युवा सबसे ज्यादा जिस चीज़ से प्रभावित होता है, वह है सोशल मीडिया की चमकदार प्रेरणा। नए साल से पहले हमें बताया जाता है कि हमें क्या करना चाहिए, जिम जॉइन करो, सुबह 5 बजे उठो, डायरी लिखो, पैसे कमाओ, खुद से प्यार करो, और सब कुछ एक ही महीने में बदल डालो। यह सब सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन सच यह है कि यह प्रेरणा नहीं, बल्कि उत्तेजना होती है, जो कुछ दिनों में ख़त्म हो जाती है।

सोशल मीडिया पर जो न्यू ईयर रेज़ोल्यूशन दिखते हैं, वे ज्यादातर दिखाने के लिए होते हैं, जीने के लिए नहीं। कोई अपनी ट्रांसफॉर्मेशन फोटो डाल रहा है, कोई अपनी मॉर्निंग रूटीन, और कोई बता रहा है कि ‘2026 मेरा साल होगा।’
युवा इन्हें देखकर सोचता है, ‘मुझे भी ऐसा ही करना चाहिए।’ लेकिन यहाँ एक ख़तरनाक बात छुपी है। यह ‘चाहिए’ अपने भीतर से नहीं, बल्कि दूसरों को देखकर पैदा होता है। जब संकल्प तुलना से पैदा होते हैं, तो वे ज्यादा दिन नहीं टिकते।
नया साल कोई जादुई बटन नहीं है जो दबाते ही ज़िंदगी बदल जाए। असल में, नया साल एक आईना है, जो हमें वही दिखाता है जो हम पूरे साल से टालते आए हैं। अगर हम पूरे साल खुद से भागते रहे, तो नया साल भी हमें वहीं खड़ा पाएगा।

अगर हम पूरे साल दूसरों की ज़िंदगी देखकर जलते रहे, तो नया साल भी वही आदत साथ लाएगा। सच तो यह है कि बदलते वर्षों के बीच जो नहीं बदलता, वही सच होता है। हमारी सोच, हमारी ईमानदारी, हमारी संवेदनशीलता, अगर ये नहीं बदलीं, तो सिर्फ तारीख़ बदलने से कुछ नहीं होता।
आज का युवा पहले से ही बहुत दबाव में है, करियर का दबाव, परिवार की उम्मीदें, और अब सोशल मीडिया का दबाव कि हर साल खुद को ‘रीब्रांड’ करो। लेकिन इंसान कोई ऐप नहीं है जिसे हर साल अपडेट किया जाए। इंसान एक यात्रा है, जिसमें रुकना, गिरना और धीरे-धीरे समझना भी शामिल है। हर साल नया बनने की ज़िद, कई बार हमें खुद से दूर कर देती है। सच्चा संकल्प बाहर नहीं, भीतर से आता है, सच्चे संकल्प वो नहीं होते जो हम पोस्ट करते हैं, सच्चे संकल्प वो होते हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता।

जैसे, खुद से झूठ कम बोलना, किसी को बेवजह नीचा न दिखाना, अपने डर को स्वीकार करना, या अपनी सीमाओं को समझना। ये बातें ट्रेंड नहीं करतीं, इसलिए सोशल मीडिया पर नहीं दिखतीं। लेकिन यही बातें इंसान को अंदर से बदलती हैं।
नया साल क्या सिखा सकता है? नया साल हमें यह याद दिलाने आता है कि ज़िंदगी भागने का नाम नहीं है। हर चीज़ तुरंत ठीक करना ज़रूरी नहीं। और हर प्रेरणा को अपनाना भी ज़रूरी नहीं। कभी-कभी सबसे बड़ा संकल्प होता है, खुद को ध्यान से सुनना। जब युवा यह समझ लेता है कि सोशल मीडिया की उत्तेजना अस्थायी है, और आत्मचिंतन स्थायी, तभी नया साल सच में नया बनता है।
नया साल कैलेंडर का परिवर्तन है, देखने वालों की दृष्टि का नहीं। लेकिन अगर इस बदलाव में हम अपनी दृष्टि बदल लें, तो हर साल नया नहीं, हर दिन सार्थक बन सकता है। युवाओं को किसी नए साल की नहीं, नए समझ की ज़रूरत है।



