






डॉ. एमपी शर्मा.
भारत की पावन भूमि सदैव संतों, महापुरुषों और अवतारों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं में से एक ऐसे दिव्य पुरुष थे श्री गुरु नानक देव जी, जिन्होंने मानवता के हृदय में प्रेम, समानता और ईश्वर भक्ति की ज्योति प्रज्वलित की। उन्होंने सिख धर्म की स्थापना की, परंतु उनके विचार किसी धर्म-सीमा में बंधे नहीं, वे संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शन हैं।

गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को तलवंडी नामक गाँव में हुआ, जो आज ननकाना साहिब (पाकिस्तान) के नाम से प्रसिद्ध है। उनके पिता मेहता कालू चाँद एक पटवारी थे और माता माता तृप्ता धर्मनिष्ठा और सरलता की प्रतीक थीं।
बालक नानक बचपन से ही असाधारण थे, वे अध्यात्म में रमे रहते। बाल्यावस्था में ही उन्होंने गुरुओं और माता-पिता को चकित कर दिया, जब उन्होंने कहा, ‘मैं उस परमसत्य की खोज में हूँ जो सभी में व्याप्त है।’

गुरु नानक देव जी का जीवन ईश्वर साक्षात्कार की यात्रा थी। उन्होंने समाज में फैले अंधविश्वास, कर्मकांड, जात-पात और धार्मिक भेदभाव को देखा। यह सब उन्हें भीतर तक व्यथित करता था। यही कारण था कि उन्होंने मानवता को सच्चे धर्म का मार्ग दिखाया, ‘ना कोई हिन्दू, ना कोई मुसलमान, सब ईश्वर की संतान हैं।’ उनका संदेश था, ईश्वर एक है (एक ओंकार), वह सबमें है, वही सत्य है।

गुरु नानक देव जी ने अपने उपदेशों को तीन सरल सूत्रों में समेटा, नाम जपो यानी सदा ईश्वर का स्मरण करो। किरत करो यानी ईमानदारी और परिश्रम से जीवनयापन करो। वंड छको यानी अपने अर्जित धन और संसाधन को बाँटकर दूसरों की सहायता करो। इन तीन सिद्धांतों में जीवन के उच्चतम आदर्श छिपे हैं कृ भक्ति, श्रम और सेवा।

गुरु नानक देव जी ने लगभग 20 वर्षों तक विश्व भ्रमण किया। इन यात्राओं को ‘उदासियाँ’ कहा गया। उन्होंने भारत, नेपाल, तिब्बत, अफगानिस्तान, अरब, ईरान और श्रीलंका तक की यात्राएँ कीं। हर स्थान पर उन्होंने अपने मधुर शब्दों और कर्म से प्रेम, समानता और सच्चाई का संदेश दिया। उन्होंने हर धर्म और संप्रदाय के लोगों से संवाद किया, प्रश्न पूछे, और सत्य को स्थापित किया।

वे मक्का पहुँचे तो उन्होंने कहा, ‘ईश्वर किसी एक दिशा में नहीं, हर ओर है।’ हरिद्वार में उन्होंने दिखाया कि बिना भावना के कर्मकांड व्यर्थ हैं। गुरु नानक देव जी ने धर्म को आचरण में ढालने की प्रेरणा दी। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। उन्होंने जाति, धर्म, लिंग या धन के आधार पर किसी भेद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा, ‘सो क्यूँ मंदा आखिए, जित जमे राजान।’ अर्थात जिस स्त्री के गर्भ से राजा तक जन्म लेते हैं, उसे नीचा कैसे कहें? उन्होंने सिखाया कि झूठ से कभी शांति नहीं मिलती। उन्होंने ‘लंगर’ की परंपरा शुरू की, ताकि कोई भूखा न रहे और सभी एक साथ बैठकर भोजन करें, यह समानता का प्रतीक है। उन्होंने प्रकृति को परमात्मा का रूप माना, ‘पवण गुरु, पानी पिता, माता धरत महत।’

गुरु नानक देव जी केवल धार्मिक उपदेशक नहीं थे, वे एक सामाजिक सुधारक और मानवतावादी दार्शनिक थे। उन्होंने उस काल में एक नई चेतना जगाई जब समाज में धर्म के नाम पर विभाजन, शोषण और अन्याय था। उनकी दृष्टि में सच्चा धर्म वही है जिसमें मानवता की सेवा हो, सत्य की साधना हो और प्रेम की ज्योति जलती रहे।

उनके भजन, शब्द और विचार बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हुए, जो सिख धर्म का पवित्र ग्रंथ है। इसमें उन्होंने लिखा, ‘जो तिस भावै, सोई थीसी, हर नामु न चढ़ै कोए।’ अर्थात, जो ईश्वर को प्रिय है, वही होता है, मनुष्य का अहंकार कुछ नहीं कर सकता।
आज जब मानवता धर्म, जाति, भाषा और सीमाओं के नाम पर बँटी हुई है, गुरु नानक देव जी के विचार पहले से कहीं अधिक आवश्यक हैं। उन्होंने कहा, ‘सबमें जोत, जोत है सोई।’ हर जीव में वही एक प्रकाश है, वही ईश्वर है। यदि हम उनकी शिक्षाओं को जीवन में अपनाएँ, तो न केवल समाज में शांति और सद्भाव बढ़ेगा, बल्कि मनुष्य का आत्मिक उत्थान भी संभव होगा।
गुरु नानक देव जी का जीवन और संदेश हमें यह सिखाते हैं कि धर्म का सार कर्म में, और कर्म का सार प्रेम में है। उन्होंने प्रेम, करुणा, समानता और सेवा को जीवन का आधार बनाया। उनका आदर्श आज भी मानवता का दीपक है, जो अंधकार में भी राह दिखाता है। एक ओंकार सतनाम, यही उनका शाश्वत संदेश है, जो सदा हमें याद दिलाता है कि ईश्वर एक है, सबमें है, और प्रेम ही उसका स्वरूप है।
-लेखक सामाजिक चिंतक और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



