




गोपाल झा.
उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे के बाद देश की राजनीति में सरगर्मी तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने उप राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी है और नामांकन प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। इस बीच, सियासी गलियारों में एक नई हलचल है, क्या विपक्ष इस बार एकजुट होकर ऐसा उम्मीदवार उतारेगा, जो मुकाबले को दिलचस्प बना दे? सूत्रों के मुताबिक, इस रणनीति के केंद्र में है राजस्थान और वहां से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी खास पहचान बनाने वाले नेता अशोक गहलोत का नाम।

जगदीप धनखड़ मूल रूप से राजस्थान से ताल्लुक रखते हैं। उनका उप राष्ट्रपति पद से इस्तीफा राजनीतिक दृष्टि से अप्रत्याशित माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी ‘राजस्थान कनेक्शन’ को विपक्ष सत्तापक्ष के खिलाफ रणनीति में भुनाने की कोशिश कर सकता है। ऐसे में अशोक गहलोत का नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा में आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। गहलोत न केवल राजस्थान बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी राजनीतिक सूझबूझ और रणनीतिक कौशल के लिए पहचाने जाते हैं। उन्हें ‘सियासत का जादूगर’ यूं ही नहीं कहा जाता, क्योंकि वे मुश्किल हालात में भी समीकरण बदलने में माहिर माने जाते हैं।

अशोक गहलोत का राजनीतिक करियर चार दशकों से अधिक का है। वे तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अपने कार्यकाल में कई बार आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना कर विजयी रहे। केंद्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) अध्यक्ष और संगठन के विभिन्न पदों पर रहते हुए गहलोत ने हर स्तर की राजनीति में खुद को साबित किया है। उनकी सबसे बड़ी ताकत है, जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव और विपक्षी दलों के नेताओं के साथ संवाद बनाए रखने की क्षमता। यही वजह है कि वे सियासी पिच पर आखिरी ओवर तक टिके रहने वाले खिलाड़ी माने जाते हैं।

यदि गहलोत को विपक्षी उम्मीदवार के रूप में उतारा जाता है, तो यह विपक्ष की एकजुटता की बड़ी परीक्षा होगी। पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष विभिन्न मौकों पर साझा उम्मीदवार उतारने में सफल तो हुआ है, लेकिन जीत की रणनीति उतनी प्रभावी नहीं रही। गहलोत की उम्मीदवारी न केवल कांग्रेस बल्कि क्षेत्रीय दलों के लिए भी स्वीकार्य हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, जेडीयू और अन्य विपक्षी दलों के साथ उनके अच्छे संबंध हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष इस अवसर का इस्तेमाल एकजुट मोर्चा बनाने में करेगा।

यदि गहलोत मैदान में आते हैं, तो सत्तारूढ़ गठबंधन को भी एक मजबूत उम्मीदवार उतारना होगा। धनखड़ के इस्तीफे के बाद यह पद खाली है, लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दल बहुमत के कारण अमूमन उप राष्ट्रपति के चुनाव में सहज जीत दर्ज करते रहे हैं। गहलोत जैसी शख्सियत के उतरने से चुनाव महज औपचारिकता न रहकर एक उच्च-स्तरीय राजनीतिक मुकाबला बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि गहलोत की उम्मीदवारी भाजपा के लिए सीधी राजनीतिक चुनौती होगी, क्योंकि वे न केवल राजस्थान बल्कि अन्य राज्यों में भी विपक्षी वोटरों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। फिलहाल, अशोक गहलोत या कांग्रेस की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया है। लेकिन जयपुर से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व अभी विपक्षी गठबंधन के भीतर बातचीत के दौर में है और अंतिम निर्णय विपक्षी दलों की सहमति से होगा। दूसरी ओर, भाजपा खेमे में भी संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा जारी है। माना जा रहा है कि सत्तापक्ष किसी ऐसे नेता को उतारेगा, जो न केवल संसद में बल्कि देशभर में राजनीतिक संदेश देने में सक्षम हो।

उप राष्ट्रपति चुनाव आम तौर पर कम चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। धनखड़ के इस्तीफे, राजस्थान कनेक्शन और अशोक गहलोत जैसे बड़े नाम के चर्चा में आने से मुकाबला दिलचस्प मोड़ ले सकता है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि विपक्ष क्या सचमुच एकजुट होकर गहलोत को उम्मीदवार बनाता है, या फिर यह महज अटकलों का दौर साबित होगा। जो भी हो, आने वाले दिनों में संसद से लेकर सियासी मंचों तक उप राष्ट्रपति चुनाव चर्चा का केंद्र रहने वाला है।

