





डॉ. सुरेंद्रसिंह शेखावत
भारत की राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक विरासत का एक अविच्छिन्न सूत्र, ‘वंदे मातरम्’ आज अपनी रचना के 150 वर्ष पूरे कर रहा है। यह मात्र एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का गान है, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे शक्तिशाली प्रेरणाओं में से एक रहा है और आज भी करोड़ों भारतीयों को एकता के सूत्र में पिरोए हुए है। 7 नवंबर 1876 को महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह अमर कृति, एक साहित्यिक रचना से शुरू होकर, राष्ट्रवाद की धड़कन और अंततः भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्थापित हुई। यह 150 वर्षों की यात्रा भारतीय इतिहास के उतार-चढ़ावों, संघर्षों और विजयों का सार प्रस्तुत करती है।

जिस समय बंकिम चंद्र ने इस गीत की रचना की, वह कालखंड भारत के लिए गहन अंधकार का समय था। ब्रिटिश उपनिवेशवाद की लोहे की जंजीरें देश को जकड़े हुए थीं। ऐसे निराशाजनक माहौल में, एक गीत का जन्म हुआ जिसने मातृभूमि को एक पूजनीय देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882 में प्रकाशित) में पिरोया गया यह गीत, भारत माता के उस रूप का वर्णन करता है जो ‘सुजलां, सुफलां, मलयजशीतलां’ हैकृजल से परिपूर्ण, फलदायी और शीतल वायु से युक्त। यह वर्णन उस भारत का था जिसे ब्रिटिश शोषण ने दरिद्र बना दिया था, लेकिन यह गीत भारतीयों को उनके देश की अखंड समृद्धि और सुंदरता की याद दिलाता था। संस्कृत और बंगाली का सुंदर मिश्रण इसकी भाषा को एक अनूठी साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करता है।

‘वंदे मातरम’ को पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गाया गया, और यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब इस साहित्यिक कृति को एक राजनीतिक हथियार और राष्ट्रीय उद्घोष का दर्जा मिला। लेकिन इसका वास्तविक क्रांतिकारी अवतार 20वीं शताब्दी के आरंभ में, विशेषकर 1905 के बंगाल विभाजन विरोधी स्वदेशी आंदोलन के दौरान देखने को मिला।

बंगाल के विभाजन ने राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काया, और ‘वंदे मातरम’ प्रदर्शनकारियों की जुबान पर चढ़कर एक अजेय नारा बन गया। ब्रिटिश सरकार ने इसकी शक्ति को भांपते हुए इसे तत्काल प्रतिबंधित कर दिया। प्रतिबंध ने इस गीत के प्रभाव को कम करने के बजाय, उसे और बढ़ाया। यह गीत दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों जैसे लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, और भगत सिंह ने इसे अपने आंदोलन का केंद्र बनाया। महात्मा गांधी ने इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी आजाद हिंद फौज के सिपाहियों में जोश भरने के लिए इसे अपनाया। जेलों की काल-कोठरी से लेकर सड़कों पर हो रहे मार्च तक, ‘वंदे मातरम’ एक संजीवनी मंत्र बन गया जिसने लाखों भारतीयों को एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट किया। यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि वह अग्निबीज थे जो क्रांति की ज्वाला को प्रज्वलित कर रहे थे।

इस गीत का सांस्कृतिक महत्व भारत की प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है, जहाँ भूमि को देवी के रूप में पूजने की भावना निहित है। यह गीत इसी ‘भूमि-माता’ की अवधारणा को सशक्त करता है। हालांकि, यह केवल एक धार्मिक स्तुति नहीं है, बल्कि समावेशी राष्ट्रवाद का प्रतीक है। यह सभी भारतीयों को, उनकी आस्था से परे, मातृभूमि के प्रति समर्पण और प्रेम की शिक्षा देता है।

लेकिन 150 वर्षों की इस यात्रा में, इस गीत को विवादों का सामना भी करना पड़ा है। 1937 में, मोहम्मद अली जिन्नाह ने इस गीत पर कुछ आपत्तियाँ उठाई थीं, जिसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय एकता को सर्वाेपरि रखते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। कांग्रेस ने गीत के केवल पहले दो छंदों को राष्ट्रीय उपयोग के लिए अपनाया, जो स्पष्ट रूप से मातृभूमि की स्तुति करते हैं और सभी धार्मिक या सांप्रदायिक संदर्भों से मुक्त हैं। यह निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया कि यह गीत सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य हो और समग्र भारतीय पहचान को मजबूत करे। इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि यह गीत मूल रूप से राष्ट्रीयता और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति है, न कि किसी विशिष्ट धार्मिक विचारधारा का।
1950 में, स्वतंत्रता प्राप्त होने के कुछ ही वर्षों बाद, ‘वंदे मातरम’ को आधिकारिक तौर पर भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। आज, जब भारत अपनी आजादी के 78 वर्ष मना रहा है और विश्व पटल पर एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में खड़ा है, तब इस गीत के 150 वर्षों का उत्सव मनाना विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह उत्सव हमें केवल इतिहास याद नहीं दिलाता, बल्कि हमें अपनी जड़ों की गहराई और उन बलिदानों की याद दिलाता है जिनके दम पर हमने आजादी हासिल की। ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ हमें एक बार फिर यह प्रण लेने का अवसर देती है कि हम उस मातृभूमि की एकता, अखंडता और समृद्धि के लिए निरंतर कार्य करते रहेंगे, जिसके लिए लाखों लोगों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

यह गीत हमें याद दिलाता है कि भले ही हम विभिन्न भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हों, लेकिन हमारी एक साझा पहचान हैकृहम सब भारत माता की संतान हैं। ‘वंदे मातरम’ की अमर ध्वनि आने वाली पीढ़ियों को भी राष्ट्र के प्रति समर्पण और प्रेम की प्रेरणा देती रहेगी। यह केवल एक गीत नहीं है, यह भारतीय होने का गौरव है, यह हमारे राष्ट्र की धड़कन है, और यह हमारी अमरता का संकल्प है।


