



भटनेर पोस्ट साहित्य डेस्क.
हनुमानगढ़, यह नाम सुनते ही सबसे पहले आंखों में सुनहरे खेत, नहरी पानी की हरियाली और किसान की मेहनत की तस्वीरें उभरती हैं। कृषि आधारित जिले के रूप में इसकी पहचान भले ही सर्वविदित हो, लेकिन इस धरती की दूसरी पहचान उतनी ही गौरवपूर्ण है, यहां के साहित्य का अनुपम संसार। यह वही मिट्टी है जिसने चंद्रसिंह ‘बिरकाळी’ और लक्ष्मीकुमार चुण्डावत जैसे साहित्य-जगत के सशक्त हस्ताक्षरों को जन्म दिया। इनकी सृजन-धारा को और भी समृद्ध करने के लिए ओम पुरोहित ‘कागद’, रामस्वरूप किसान, दीनदयाल शर्मा और डॉ. सत्यनारायण सोनी जैसे दर्जनों रचनाकारों ने कलम को साधना बना लिया।
इस क्षेत्र में साहित्यिक वातावरण को गरिमा देने में ओम पुरोहित ‘कागद’ का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने न केवल रचना के स्तर पर ऊँचाइयाँ छुईं, बल्कि मंच और अवसरों का द्वार भी खोलते रहे। उनके असमय निधन के बाद हनुमानगढ़ का साहित्यिक परिदृश्य कहीं न कहीं ठहर-सा गया, विशेषकर नए रचनाकारों के लिए मंचों का अभाव महसूस होने लगा। फिर भी, उनकी स्मृति और प्रयासों को जीवित रखने के लिए कागद फाउंडेशन हर वर्ष तीन पुरस्कारों के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, दिवंगत साहित्यकार ओम पुरोहित ‘कागद’ की पुण्यतिथि पर हनुमानगढ़ स्थित रयान कॉलेज फॉर हायर एजुकेशन में एक अनूठा आयोजन हुआ। बीकानेर संभाग के हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर जिले के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित प्रश्नोत्तरी। संयोजन की जिम्मेदारी हेमपुष्प ने निभाई।

इस प्रश्नोत्तरी में क्षेत्रीय साहित्यिक आकाश के अनेक नक्षत्रों, चंद्रसिंह ‘बिरकाळी’, लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत, ओम पुरोहित ‘कागद’, डॉ. भरत ओला, करणीदान बारहठ, रामस्वरूप किसान, दीनदयाल शर्मा, डॉ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’, डॉ. सत्यनारायण सोनी, डॉ. जितेंद्र कुमार सोनी, गोविंद शर्मा, विनोद स्वामी, राजेश चड्ढा, नरेश मेहन, हनुमान दीक्षित, पवन शर्मा, प्रमोद कुमार शर्मा, डॉ. प्रेम भटनेरी, मानसी शर्मा, गुरदीप सोहल, मनोज देपावत और विरेंद्र छापोला जैसे अन्य साहित्यकारों के जीवन और रचनाओं से जुड़े प्रश्न पूछे गए।

सुखद यह रहा कि इसी बहाने युवाओं का परिचय क्षेत्रीय रचनाओं से हुआ। उन्होंने ‘बादळी, लू और डाफर’, ‘माटी री महक’, ‘कोई तो है’, ‘कै रे चकवा बात’, ‘मूमल’, ‘अमोलक वातां’, ‘अंतस री बळत’, ‘मेरे प्रतिमान’, ‘चिंटू-पिंटू की सूझबूझ’, ‘पापा झूठ नहीं बोलते’, ‘धान कथा’, ‘जीव री जात’ और ‘खेजड़ी बुआ’ जैसी लब्धप्रतिष्ठ कृतियों के पृष्ठों को पलटा, उनके भाव-संसार को समझा।

हेमपुष्प के मुताबिक, ओम पुरोहित ‘कागद’ ने राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। उनकी स्मृति को जीवंत रखने के लिए रयान कॉलेज में ‘कागद कक्ष’ की स्थापना की गई है। एक ऐसा कक्ष जो उनके साहित्यिक व्यक्तित्व, विचार और संघर्ष की याद दिलाता रहेगा।

कॉलेज के प्राचार्य एवं कागद फाउंडेशन के कोषाध्यक्ष डॉ. संतोष राजपुरोहित ने ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहा, ‘ऐसे आयोजनों का उद्देश्य विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र के साहित्य और साहित्यकारों से परिचित कराना है, साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता को प्रोत्साहित करना भी है।’

विख्यात शायर राजेश चड्ढा ने कार्यक्रम की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा, ‘कागदजी को सच्ची श्रद्धांजलि देने का यह अलहदा तरीका है। वे सदैव रचनाधर्मियों को प्रोत्साहित करने में आगे रहे। इस आयोजन से यही संदेश जाता है कि अन्य रचनाकारों को भी नए लेखकों के लिए मार्गदर्शक और सहयोगी बनना चाहिए।’
प्रतियोगिता में बीए चतुर्थ सेमेस्टर की राधिका ने प्रथम स्थान तथा बीए प्रथम सेमेस्टर की डोली गर्ग ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। विजेताओं को महाविद्यालय के उप-प्राचार्य अनिल शर्मा, सहायक आचार्य ओमप्रकाश राजपुरोहित और सुखवीर कौर द्वारा स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

विख्यात साहित्यकार डॉ. भरत ओला ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘यह आयोजन केवल प्रश्नोत्तरी नहीं था, बल्कि यह एक पुल था, अतीत के साहित्यिक वैभव और वर्तमान की नई कलमों के बीच। जिस प्रकार खेत की मिट्टी को उर्वर बनाए रखने के लिए समय-समय पर खाद और पानी जरूरी होता है, उसी तरह साहित्य की भूमि को भी ऐसे आयोजनों की जरूरत है। हनुमानगढ़ के युवा जब अपने ही क्षेत्र के साहित्यिक महापुरुषों की कृतियों को पढ़ेंगे, समझेंगे और उनसे प्रेरणा लेंगे, तभी यह उजास आगे बढ़ेगा।’

वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार डॉ. कृष्ण कुमार ‘आशु’ कहते हैं, ‘ओम पुरोहित ‘कागद’ भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत, उनकी सोच और उनकी कलम की नमी इस धरती के शब्दों में, इस क्षेत्र की बोलियों में और युवाओं की जिज्ञासा में जीवित है। यह कार्यक्रम उसी जीवंतता का साक्षी बना, एक बार फिर याद दिलाते हुए कि साहित्य केवल पन्नों पर दर्ज शब्द नहीं, बल्कि समाज की आत्मा की भाषा है।’

