



गोपाल झा.
लोकतंत्र कोई सालाना उत्सव नहीं, यह रोज़ की ‘क्लास’ है, और सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि सब इसके नियमित विद्यार्थी। जो इसे समझ ले, वही सच्चे अर्थों में लोकसेवक कहलाने का अधिकारी होता है। बाकी तो बस हाजिरी लगाते हैं, परीक्षा के दिन घबराते हैं। हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी क्षेत्र में राठीखेड़ा के पास प्रस्तावित एथेनॉल प्लांट का विवाद इसी लोकतांत्रिक परीक्षा का ताज़ा प्रश्नपत्र बनकर सामने आया। डेढ़ साल पुराना यह सवाल अब इतना बड़ा हो गया कि राज्य सरकार के नुमाइंदों के माथे पर चिंता की सिलवटें साफ दिखने लगीं। वजह सीधी है, यह इलाका खेती-किसानी का है, और यहां किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला निर्णायक वर्ग है। यह सच देर से ही सही, पर सरकार के दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक दे चुका है।

किसानों की आशंका कोई हवा में तैरती अफ़वाह नहीं थी। जल और वायु प्रदूषण जैसे सवाल इस सिंचित क्षेत्र में जीवन-मरण से जुड़े हैं। ज्ञापन दिए गए, आवाज़ उठाई गई, लेकिन सत्ता के गलियारों में वह आवाज़ दीवारों से टकराकर लौट आई। संवाद की जगह चुप्पी ने ले ली, और चुप्पी के बाद जब रातों-रात गिरफ्तारियों की रणनीति अपनाई गई, तो आग में घी पड़ गया। किसान अपराधी नहीं थे, फिर भी अपराधियों जैसा व्यवहार उनके हिस्से आया। दस दिसंबर की हिंसक झड़प उसी की परिणति थी। बेशक, यहीं से सरकार संवाद की परीक्षा में पहली बार फिसल गई।

जिला मुख्यालय पर महापंचायत का ऐलान हुआ, भीड़ जुटी, और जनता का धैर्य भाषणों में नहीं, सवालों में बदलने लगा। सरकार तब जागी जब उसे अंदेशा हुआ कि यह आंदोलन अब स्थानीय नहीं रहेगा। बड़े नेताओं की आहट और जिला मुख्यालय की ओर बढ़ता कदम सत्ता के लिए चेतावनी बन गया। यह लोकतंत्र का वही क्षण था, जब शासक को समझ आता है कि जनता को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम में जिला प्रशासन की भूमिका उल्लेखनीय रही। जिला कलक्टर डॉ. खुशाल यादव और पुलिस अधीक्षक हरि शंकर ने वह संतुलन साधा, जो ऐसे संवेदनशील हालात में सबसे कठिन होता है। कानून का इकबाल भी बना रहे और नागरिक स्वतंत्रता पर आंच भी न आए, यह आसान काम नहीं। बातचीत का रास्ता खोला गया, भरोसे की ज़मीन तैयार की गई और शांति व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई। महापंचायत हुई, भीड़ आई, नेताओं ने मंच संभाला, पर हालात बेकाबू नहीं हुए। यह प्रशासनिक परिपक्वता की परीक्षा थी, जिसमें यह युवा जोड़ी सफल रही।

किसान प्रतिनिधियों की भी परीक्षा थी। उकसावे के बीच संयम बनाए रखना, मुद्दे से न भटकना और संवाद के लिए दरवाज़ा खुला रखना, यह भी संघर्ष का ही एक रूप है। एकजुटता और प्रतिबद्धता के साथ उन्होंने यह साबित किया कि लोकतंत्र में दबाव नहीं, संवाद स्थायी समाधान की कुंजी है। संघर्ष किया, पर अराजकता नहीं चुनी। इसलिए उनकी बात सुनी गई।
अब सवाल सरकार का है। सरकार इस पूरे प्रकरण में अभी उत्तीर्ण नहीं हुई है। उसे पहली बार फेल होने का एहसास हुआ है, और अब उसे ‘सप्लीमेंट्री’ मिली है। यह पूरक परीक्षा केवल फाइलों में समाधान ढूंढने की नहीं, बल्कि भरोसा बहाल करने की है। स्थायी समाधान देना, पर्यावरणीय आशंकाओं का वैज्ञानिक और पारदर्शी उत्तर देना, और सबसे अहम, किसानों को साझेदार मानकर निर्णय लेना, यही इस परीक्षा का सिलेबस है।

फिलहाल जिले की जनता ने राहत की सांस ली है कि टकराव टल गया, हालात संभल गए। लेकिन लोकतंत्र में अस्थायी राहत को सफलता नहीं कहा जा सकता। असली सफलता तब होगी, जब संवाद स्थायी होगा और विकास, विनाश का पर्याय नहीं बनेगा।इस पूरे घटनाक्रम से इतना स्पष्ट है कि सरकारें जब सुनना बंद करती हैं, तब सड़कें बोलने लगती हैं। और जब संवाद लौटता है, तब लोकतंत्र अपनी असली शक्ल में सामने आता है। परीक्षा अभी बाकी है, परिणाम आना शेष है। देखना यह है कि सरकार इस बार तैयारी के साथ उतरती है या फिर इतिहास खुद को दोहराने का मौका पा जाता है। यही है इम्तहान का सच।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं



