




डॉ. एमपी शर्मा.
मानव सभ्यता की यात्रा में यदि किसी एक मूल्य ने हर युग, हर संस्कृति और हर समाज को जोड़े रखा है, तो वह है,सत्य। साम्राज्य ढहे, विचारधाराएँ बदलीं, सत्ता के चेहरे परिवर्तित हुए, लेकिन सत्य का दीपक युगों-युगों तक अटल ज्योति की तरह जलता रहा। भारत ने इसे अपने राष्ट्रीय मंत्र ‘सत्यमेव जयते’ के रूप में स्वीकार कर पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि असत्य का वैभव क्षणभंगुर है, जबकि सत्य की चमक अमर और अजेय है। सत्य के पथ पर चलना कठिन अवश्य है, लेकिन यही मार्ग आत्मिक शांति, सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक अमरता का द्वार खोलता है। यही कारण है कि ऋषियों से लेकर संतों तक, राजा हरिश्चंद्र से लेकर महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन तक, सभी ने जीवन से यह प्रमाणित किया कि अंततः विजय उसी की होती है जो सत्य को जीवन का धर्म बना लेता है। महात्मा कबीर ने कहा था,
‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।’

राजा हरिश्चंद्र ने सत्य के लिए अपना राजपाट, परिवार और सुख-सुविधाएँ त्याग दीं। श्मशान में दास बनकर काम किया, पर झूठ नहीं बोला। अंततः सत्य की शक्ति ने उन्हें पुनः प्रतिष्ठा दिलाई। उनका नाम अमर हो गया, सत्यवादी हरिश्चंद्र। सत्यकाम जाबाल। छांदोग्य उपनिषद की कथा में यह बालक माता से भी पिता का नाम न जानने की सच्चाई गुरु से छिपाता नहीं। गुरु गौतम ने कहा, ‘तुम ब्राह्मण हो, क्योंकि तुम सत्यवादी हो।’ सत्य ही उन्हें ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बना गया।

महात्मा गांधी ने अंग्रेजी साम्राज्य को “सत्याग्रह” के बल पर चुनौती दी। असंख्य जेल यातनाएँ और उपहास झेला, पर सत्य और अहिंसा की शक्ति ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई। गौतम बुद्ध ने कहा, ‘तीन बातें छुप नहीं सकतीं। सूर्य, चंद्र और सत्य। उन्होंने अपने जीवन में यह दिखाया कि किसी भी दुख का निवारण केवल सच्चाई को स्वीकार करने और उस पर चलने से ही संभव है।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन बचपन से ही सत्यवादी थे। एक बार दुकान में गलती से एक ग्राहक से कुछ पैसे अधिक ले लिए। जैसे ही उन्हें पता चला, वे रातभर चलकर उस ग्राहक को पैसे लौटाने पहुँचे। यही सत्यनिष्ठा आगे चलकर उन्हें अमेरिका का महान राष्ट्रपति और ‘ईमानदार अबे’ बना गई।

मराठी संत तुकाराम ने अपने भजनों में सत्य और ईमानदारी को सबसे बड़ा धर्म बताया। जब समाज ने उन्हें झूठ और आडंबर से दबाना चाहा, तब भी उन्होंने सत्य की राह नहीं छोड़ी और उनकी वाणी आज भी जीवित है।
सत्य पर क्यों चलें?
इससे आत्मिक शांति मिलती है। झूठ मन को बोझिल करता है, सत्य मन को हल्का करता है। असत्य की विजय क्षणिक होती है, पर सत्य अनंतकाल तक प्रेरणा देता है। रिश्ते, समाज और राष्ट्र केवल विश्वास पर टिके हैं, और विश्वास का आधार सत्य ही है। कवि कृष्ण बिहारी नूर ने कहा, ‘सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे, झूठ की कोई इंतहा ही नहीं।’

सत्य का मार्ग कठिन जरूर है, पर वही मनुष्य को शांति, सम्मान और अमरता देता है। हरिश्चंद्र, सत्यकाम, बुद्ध, गांधी या लिंकन। सभी ने यह सिद्ध किया कि सत्य की जड़ें गहरी होती हैं, असत्य की नहीं। सत्य का अनुसरण करना ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। सत्य कभी पराजित नहीं होता। सत्यमेव जयते!
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं

