

भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
हनुमानगढ जिले में ईंट-भट्टों की दुनिया बाहर से भले ही ‘मिट्टी, धुआँ और मजदूरी’ वाली लगती हो, लेकिन हकीकत में यह पूरा कारोबार नियमों, तकनीक और मौसम के कैलेंडर के हिसाब से चलता है। राजस्थान सरकार के नए आदेशों के बाद यह सेक्टर फिर चर्चा में है। हनुमानगढ़ जिले का परिदृश्य तो कुछ ऐसा बन गया है कि भट्टा संचालकों की सांसे भी उतनी ही अनियमित चल रही हैं, जितनी पुरानी तकनीक वाले भट्टों से निकलने वाला धुआँ। नए साल से भट्टे खुलने वाले हैं और साथ ही नई जिम्मेदारियाँ भी। जो निभानी होंगी, नहीं तो जून 2026 के बाद मुसीबत सिर पर होगी।

राज्य में करीब पाँच हजार भट्टे और हनुमानगढ़ में लगभग चार सौ। संख्या खुद बता देती है कि ईंट-भट्टे केवल इमारतें नहीं पकाते, स्थानीय अर्थव्यवस्था भी पकाते हैं। पिछले साल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक बड़ा फैसला सुनाया। कहा गया कि प्रदूषण कम करना है तो संचालन अवधि घटानी होगी। पहले साल में नौ महीने धुआँ उड़ता था, अब सिर्फ छह महीने, पहली जनवरी से तीस जून तक। इसके बाद भट्टा बंद, मालिक आराम करें और आसमान भी।

मगर नियम यहीं नहीं रुके। जिग-जैग तकनीक। नाम सुनकर बच्चों की रंगीन कॉपियों जैसा लगता है, लेकिन काम बहुत गंभीर। इस तकनीक में ईंटें ऐसे जमाई जाती हैं कि हवा सीधी नहीं, टेढ़ी-मेढ़ी चाल से गुजरती है। इससे दहन बेहतर होता है, ईंधन बचता है, धुआँ कम निकलता है और ईंट भी एकसार पकती है। बदलाब बस इतना है कि तकनीक अपनाने वाला संचालक थोड़ी देर तक माथा पकड़े रहता है, पर फायदा लम्बा है।

जानकारों का कहना है कि भट्टा मालिकों के सामने दो रास्ते हैं, या तो पुरानी कार्यप्रणाली में अटके रहें और 2026 के बाद पूरे सेट-अप पर तगड़ा जोखिम उठाएँ; या फिर तकनीक अपनाएँ, थोड़ी लागत लगाए और अपना धंधा लंबी रेस का बनाए रखें। परंपरागत कामों में बदलाव हमेशा दर्द देता है, यह तो सदी पुरानी कहानी है। पर हवा साफ रखने की जिम्मेदारी भी उसी समाज की है, जिसकी छत ईंटों से खड़ी होती है। यह संतुलन ही असली चुनौती है। राजस्थान में ईंट-भट्टों का भविष्य अब नियमों की किताब और तकनीक के पन्नों पर टिक गया है। भट्टे जनवरी में खुलेंगे तो धुआँ पहले जैसा दिखेगा, पर उसके पीछे का गणित बदल चुका होगा। ईंट की कीमत से लेकर उत्पादन की शैली तक सब नया है। अगले डेढ़ साल में कौन संचालक समय रहते खुद को ढालता है और कौन सरकारी एक्शन की पकड़ में आता है, यह आने वाला समय तय करेगा। फिलहाल इतना ही साफ है कि दुनिया बदली है, और भट्टा तकनीक भी बदलनी ही पड़ेगी। यहां से आगे की कहानी वही लिखेगा, जो परंपरा के साथ तकनीक को जोड़ लेगा।

सरकार ने इस तकनीक को अपनाने की अंतिम तारीख जून 2026 रखी है। मतलब अभी डेढ़ साल की मोहलत है, लेकिन इसके बाद पुरानी प्रणाली वाले भट्टे पकड़ में आ जाएंगे। हनुमानगढ़ जिले में अभी 55 संचालक ऐसे हैं जिन्होंने अपने भट्टों को जिग-जैग में ढाल दिया है। खर्चा हल्का नहीं। मक्कासर के संचालक वेद भांभू बताते हैं कि उन्हें लगभग तीस लाख रुपए लगाने पड़े। बात में थोड़ी नाराज़गी भी झलकती है कि मजदूर स्थानीय नहीं मिलते, बाहर से बुलाने पड़ते हैं। नियम एक तरफ, असल चुनौती तो तकनीक समझने वाला कारीगर ढूँढना है।

नियम बदलते ही बाज़ार भी करवट लेता है। ईंट की कीमत इसका ताज़ा उदाहरण है। पिछले वर्ष 4,200 से 4,700 रुपए प्रति हजार में मिलने वाली ईंट इस बार 5,200 से 5,500 तक पहुँचने की बात हो रही है। यानी नए साल में हजार रुपए प्रति हजार ईंट का उछाल। कुछ महीने पहले तो हाल और भी कड़क था। भट्टे बंद हुए तो ईंट 6,000 से 6,500 प्रति हजार तक जा पहुँची। अब दोबारा जनवरी में भट्टे शुरू होंगे तो घर बना रहे लोगों को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। निर्माण की लागत चाहे कितनी भी बढ़े, आम आदमी की उम्मीद को तो जेसीबी भी नहीं रोक सकती।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी साफ संकेत दे चुका है कि नियमों में नरमी सिर्फ निर्धारित अवधि तक है। उसके बाद निरीक्षण, नोटिस और कार्रवाई, सब तय है। बोर्ड के रीजनल ऑफिसर सुधीर कुमार बताते हैं कि सभी संचालकों को दिशा-निर्देश दे दिए गए हैं। जिन्होंने तकनीक अपडेट कर ली, वे ठीक हैं। बाकी को पाबंद किया गया है। अगर कोई प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करता है तो कार्रवाई बिल्कुल तय है। सरकारी भाषा में यह चेतावनी होती है, ज़मीनी भाषा में ‘अब बचना मुश्किल है।’




