




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
अमरीका द्वारा भारत के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। वैश्विक मंचों पर इस कदम की निंदा हो रही है, लेकिन भारत में इसका असर केवल व्यापारिक ही नहीं, बल्कि सियासी बहस का हिस्सा भी बन गया है। राजस्थान जैसे निर्यात-प्रधान राज्यों में इसे ‘आर्थिक दबाव की राजनीति’ के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका सीधा असर न केवल उद्योग जगत, बल्कि लाखों मजदूरों के जीवन पर भी पड़ सकता है। राजस्थान के निर्यातकों ने स्पष्ट किया है कि वे देश के आत्मसम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। ‘व्यापार लाभ से बढ़कर राष्ट्रीय गरिमा है,’ यह भाव अब औद्योगिक गलियारों में मुखर हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में भारत-अमरीका संबंधों की कसौटी बनेगा और केंद्र सरकार के लिए कूटनीतिक संतुलन साधना बड़ी चुनौती होगी।

राजस्थान हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर्स जॉइंट फोरम के कॉर्डिनेटर नवनीत झालानी बताते हैं कि अमरीकी बायर्स और राजस्थान के एक्सपोर्टर्स के बीच अब ‘अनिश्चितता का दौर’ शुरू हो गया है। उत्पादन के अंतिम चरण में पहुंचे ऑर्डर्स को लेकर भी निर्णय नहीं हो पा रहा है, क्योंकि अमरीका ने केवल 21 दिन की लोडिंग अवधि दी है। रक्षा बंधन और स्वतंत्रता दिवस की छुट्टियों के कारण इस समयसीमा में शिपमेंट संभव नहीं है, और 21 दिन बाद की डिलीवरी पर अमरीकी खरीदार भारी पेनल्टी लगा रहे हैं। कई बायर्स ऑर्डर्स को ‘होल्ड’ पर डाल चुके हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखें तो विपक्ष इस मुद्दे को केंद्र सरकार की ‘व्यापार कूटनीति की विफलता’ के रूप में पेश कर सकता है। कांग्रेस पहले ही मोदी सरकार पर आरोप लगाती रही है कि वह अमरीका के साथ ‘बराबरी के रिश्ते’ निभाने में नाकाम रही है और लगातार आर्थिक दबाव में झुकती रही है। अब जबकि राजस्थान में करीब 5 लाख कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी पर संकट है, यह मामला चुनावी बहस में गरमा सकता है।
वहीं, भाजपा के करीबी राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘संक्रमण काल की कठिनाई’ बताते हैं। उनके अनुसार भारत अब वैश्विक व्यापार में ‘लो कॉस्ट सप्लायर’ से ‘स्ट्रेटेजिक प्लेयर’ बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ऐसे टकराव ‘लॉन्ग टर्म पॉलिसी गेन’ के लिए जरूरी हैं।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि केंद्र सरकार ने जल्द वैकल्पिक बाजार और राहत पैकेज घोषित नहीं किए, तो यह मुद्दा केवल औद्योगिक चिंता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ‘लोकतांत्रिक असंतोष’ में बदल सकता है। राजस्थान जैसे राज्य, जहां हस्तशिल्प, टेक्सटाइल और ज्वैलरी का निर्यात अहम है, वहां के निर्यातकों की नाराजगी सीधे तौर पर सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य डॉ. संतोष राजपुरोहित कहते हैं, ‘यह मामला अब सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि भारत-अमरीका संबंधों के ‘शक्ति संतुलन’ और भारतीय नेतृत्व की वैश्विक सौदेबाजी क्षमता की असली परीक्षा माना जा रहा है।’




