



विमल चौहान.
फिल्मी पर्दे पर अनेक नायक आए-गए, पर धर्मेन्द्र जैसा कद विरले ही किसी को मिला। लाखों दिलों पर राज करने वाले इस अभिनेता की यात्रा किसी तैयार पथ पर चलकर नहीं बनी थी; यह पगडंडी उन्होंने अपने लगातार संघर्ष, धैर्य और अद्भुत व्यक्तित्व से खुद तैयार की थी। पंजाब के गुरदासपुर के एक साधारण किसान परिवार से उठकर बॉलीवुड में लगभग 300 फिल्मों तक का सफ़र तय कर लेना किसी लोककथा जैसा ही लगता है।

उनसे पहली बार मिलने का अवसर पुष्कर में आया, जब वे ‘बटवारा’ की शूटिंग पर पहुँचे थे। परदे पर जितने प्रभावशाली दिखते थे, सामने उतने ही सहज, मिलनसार और अपनापन बाँटने वाले। बाद में ‘हुकूमत’ और कई अन्य फिल्मों की शूटिंग के दौरान मुंबई में उनसे मुलाकातें होती रहीं। हर बार वही आत्मीय मुस्कान, वही ज़मीन से जुड़ा हुआ व्यवहार, जैसे सितारा नहीं, पड़ोस का कोई परिचित व्यक्ति सामने खड़ा हो। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि कोई भी उनसे बातचीत करते-करते अपना संकोच भूल जाता।

राजस्थान से उन्हें एक विशेष लगाव था। वे कहते थे कि यहाँ की धरती, यहाँ का सौंदर्य और यहाँ के लोग उन्हें हमेशा अपनापन देते रहे। अपने संघर्ष भरे शुरुआती दौर को याद करते हुए उन्होंने एक बार बताया था कि ‘मेरा गाँव मेरा देश’ जिसकी शूटिंग राजस्थान में हुई थी, ने मानो उनके करियर को नई सांसें दीं। उस फिल्म की सफलता को वे किसी वरदान की तरह याद करते थे। मजबूत कद-काठी, गांठदार बाजुएँ, और ‘ही-मैन’ वाली छवि के पीछे भी उनकी दिनचर्या में अनुशासन छिपा था। एक मुलाकात में जब उनसे उनके फिट शरीर का राज पूछा, तो उन्होंने बड़े सरल भाव से कहा, ‘व्यायाम’ बस नियमित व्यायाम।’ खाने-पीने के शौकीन ज़रूर थे, पर शरीर को लेकर बेहद सजग भी।

धर्मेन्द्र न केवल शानदार अभिनेता थे बल्कि संवेदनशील इंसान भी। बीकानेर से जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा तो उस समय उनसे नज़दीकियाँ और बढ़ीं। हनुमानगढ़ में एक दैनिक अखबार के ब्यूरो प्रमुख के रूप में जब चुनावी माहौल में उनसे मेरी मुलाकात हुई, वे भीतर से काफी चिंतित दिखाई दिए। उन्हें हार का भय था, ‘इज्जत के काँके न कट जाएँ’, यह वाक्य उन्होंने सचमुच की घबराहट के साथ कहा था। उनकी इस मनःस्थिति को देखकर मैंने उन्हें ब्यावर के विख्यात ज्योतिषी शंभू गुरु से मिलवाया। गुरुजी ने जब उन्हें निश्चिंत होकर जीत का भरोसा दिया, तो धर्मेन्द्र के चेहरे पर वही सधा हुआ आत्मविश्वास लौट आया। और परिणाम सभी के सामने था, वे विजयी रहे।

उनकी शख्सियत के कई सुंदर पहलू थे। फोटोग्राफी, शेरो-शायरी, और दोस्तों की महफ़िल, इन सबमें उन्हें आनंद मिलता था। कई बार वे अपने लिखे शेर भी सुनाते, जिनमें भावनाओं और जीवन की सादगी दोनों का सुंदर मेल होता। अपने बच्चों से वे बेहद मोह करते थे और अपने प्रशंसकों, साथियों तथा जूनियर कलाकारों से परिवार जैसा व्यवहार करते थे। यह उनका मानवीय पक्ष था जिसने उन्हें केवल बड़ा अभिनेता नहीं, बड़ा इंसान भी बनाया।

धर्मेन्द्र से जुड़ी मेरी यादों में हर मुलाकात एक अलग गर्मजोशी लेकर आती है। उनकी सादगी, उनका अपनापन और उनका वह सच्चा मन, इन सबने उन्हें हिंदी सिनेमा में ही नहीं, मेरे जीवन की स्मृतियों में भी अमिट बना दिया। ऐसे कलाकार को याद करना मानो समय के किसी उजले पन्ने को फिर से खोलकर पढ़ना है। हृदय की गहराइयों से उन्हें नमन, सिनेमा के ही-मैन को, और ज़िंदगी के महान इंसान को।


