




गोपाल झा.
लोकतंत्र में जनता ही सर्वाेच्च है, यह पंक्ति हम बचपन से सुनते आए हैं। परंतु आज इस पंक्ति का स्वरूप बदल रहा है। जनता की आवाज़ अब शांत प्रतिवाद या ज्ञापनों से नहीं, बल्कि थप्पड़ों, जूतों और चप्पलों से निकल रही है। हाल की घटनाएँ इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, लालसोट में तहसीलदार को वकीलों ने थप्पड़ जड़ दिए, दिल्ली में गुजरात से आए व्यक्ति ने मुख्यमंत्री पर हमला कर दिया और हनुमानगढ़ में विधायक के नेतृत्व में बिजली विभाग के खिलाफ ‘चप्पल मार्च’ निकाला गया। ये घटनाएँ मामूली नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गहराती खाई की ओर संकेत हैं।

इस पर दो नजरिए बन सकते हैं। पहला यह कि जनता का यह रवैया टकराव और अराजकता की ओर ले जाएगा। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं। अगर यही हाल रहा तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में ‘घोषित’ रूप से ‘अराजकता’ की स्थिति पैदा हो जाएगी। हिंसा चाहे जनाक्रोश की उपज हो या सत्ता की उदासीनता का परिणाम, उचित नहीं मानी जा सकती। लोकतांत्रिक संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए, न कि हाथापाई और अपमानजनक व्यवहार के।

परंतु दूसरा पहलू कहीं अधिक गहरा है। आखिर, जनता इस कदर आक्रोशित क्यों हो रही है? क्यों उसे लगने लगा है कि ‘भय बिनु होय न प्रीति’ ही अब एकमात्र उपाय है? जनता का यह रूप केवल असंतोष का नहीं, बल्कि ठगे जाने की अनुभूति का परिणाम है। ‘अच्छे दिन’ जैसे जुमले अब खोखले प्रतीत होने लगे हैं। उम्मीदों और वादों के बीच जो दूरी है, वही अब निराशा और क्रोध का सेतु बन चुकी है।

अगर राजस्थान को ही केंद्र में रखें, तो स्थिति और स्पष्ट दिखाई देती है। विपक्ष की शिकायतें एक तरफ, परंतु सत्तापक्ष के लोग स्वयं स्वीकारने लगे हैं कि राज्य में जनप्रतिनिधियों की कोई सुनवाई नहीं हो रही। ब्यूरोक्रेसी के जाल में सब कुछ उलझा हुआ है। मंत्रियों की स्थिति यह है कि स्वयं उनके आदेश भी निचले स्तर पर ‘फाइलों’ में दम तोड़ देते हैं। जब मंत्रियों की यह दशा है तो विधायकों और आम जनता की स्थिति क्या होगी, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। यह परिदृश्य लोकतंत्र का वह स्वरूप नहीं है, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी।

आज अधिकांश मंत्री ‘लफ्फाजी’ में व्यस्त दिखाई देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास ठोस कार्य करने के लिए कुछ बचा ही नहीं, इसलिए जब भी वे मीडिया या जनता के बीच आते हैं, बेलगाम बयानबाजी करके सुर्खियाँ बटोरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि मीडिया भी इन्हीं हल्के-फुल्के वक्तव्यों को ‘मसालेदार’ सुर्खियों में बदलकर परोसता है। परंतु जनता का धैर्य अब जवाब देने लगा है। उसकी निराशा अब क्रोध का रूप लेने लगी है, और यही क्रोध थप्पड़ों, चप्पलों और हमलों के रूप में बाहर आ रहा है।
राजस्थान, जो अपनी शांति, धैर्य और संयम के लिए पहचाना जाता था, अब धीरे-धीरे आक्रामकता का उदाहरण बन रहा है। यह आक्रामकता सिर्फ भीड़ का उबाल नहीं है, बल्कि शासन-प्रशासन की विफलताओं का आईना है। जब जनता को लगे कि उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह अनसुनी की जा रही है, तब वह लोकतांत्रिक भाषा छोड़कर आक्रोश की भाषा बोलने लगती है। यही भाषा अब राजस्थान की गलियों और चौपालों में सुनाई देने लगी है।

यह समय है आत्ममंथन का। सरकार को यह समझना होगा कि जनता का क्रोध केवल विरोध नहीं, बल्कि चेतावनी है। चेतावनी इस बात की कि अब खोखले वादे, असमर्थ ब्यूरोक्रेसी और लफ्फाजी नहीं चलेगी। जनता ठोस कार्रवाई, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व चाहती है। लोकतंत्र की सच्चाई यही है कि जनता सब्र भी रखती है और समय आने पर हिसाब भी लेती है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार इन घटनाओं से सबक लेगी? क्या वह जनता के आक्रोश को संवेदनशीलता से सुनेगी और सुधारात्मक कदम उठाएगी? या फिर राजस्थान, जो शांत और संयत स्वभाव के लिए जाना जाता है, आगे भी आक्रामकता के नए उदाहरण गढ़ता रहेगा?

निर्णय जनता को नहीं, सरकार को करना है। जनता तो हमेशा वही करेगी, जो उसकी पीड़ा को आवाज़ देगा। पर सरकार यदि इस आवाज़ को सुनने से इनकार करेगी, तो लोकतंत्र की यह नदी धीरे-धीरे अपने किनारे तोड़कर बाढ़ का रूप धारण कर लेगी। और तब उस बाढ़ में केवल जनता ही नहीं, सत्ता की नाव भी बह जाएगी। इसमें दो राय नहीं। बेशक।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं


