





डॉ. एमपी शर्मा.
भारत की भूमि सदा से ही प्रतिभाओं की जन्मस्थली रही है। यहाँ ऐसे असंख्य व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि इंसान की सीमाएँ उतनी ही हैं जितनी वह स्वयं तय करता है। इन्हीं विलक्षण विभूतियों में एक नाम है, डॉ. श्रीकांत जिचकर। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सीखना केवल डिग्रियाँ पाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है; और जो साधक इस मार्ग पर अडिग रहता है, वह स्वयं प्रेरणा का प्रतीक बन जाता है।

4 सितंबर 1954 को महाराष्ट्र की भूमि पर जन्मे डॉ. जिचकर एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने शिक्षा को जीवन का सर्वाेच्च उद्देश्य मान लिया था। आमतौर पर लोग एक या दो क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन डॉ. जिचकर ने तो ज्ञान के महासागर में गहराई तक उतरकर उसके हर आयाम को छू लिया। उन्होंने कुल 20 से अधिक डिग्रियाँ अर्जित कीं, जिनमें एमबीबीएस, एमडी, एलएलबी, एलएलएम, एमबीए, बीजेएमसी और डी.लिट (संस्कृत) जैसी विविध विधाओं की उपाधियाँ शामिल थीं। यही नहीं, उन्होंने लोक प्रशासन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अंग्रेजी साहित्य, मनोविज्ञान, और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्रियाँ भी प्राप्त कीं, और हर परीक्षा में प्रथम स्थान व स्वर्ण पदक हासिल किया।

1973 से 1990 तक लगातार परीक्षा देना और हर बार शीर्ष पर रहना किसी साधना से कम नहीं। यह केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं, बल्कि एक अनवरत परिश्रम और असीम जिज्ञासा का प्रमाण है। डॉ. जिचकर ने कभी भी ‘सीखने’ को उम्र या पद से नहीं जोड़ा; उनके लिए यह जीवन की शाश्वत प्रक्रिया थी।

शिक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक सेवा में भी उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। 1978 में भारतीय पुलिस सेवा में चयन हुआ, लेकिन ज्ञान-पिपासु जिचकर ने यह पद त्याग दिया। दो वर्ष बाद 1980 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए, पर वहाँ भी उनकी आत्मा को शांति नहीं मिली। उन्होंने दोबारा त्यागपत्र दिया और राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा, क्योंकि वे केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ करना चाहते थे।

राजनीति में प्रवेश के बाद वे कांग्रेस पार्टी से विधायक बने और एक साथ 14 विभागों के मंत्री रहे, यह अपने आप में एक अनूठा रिकॉर्ड है। बाद में वे राज्यसभा और लोकसभा (भंडारा-गोंदिया व रामटेक) से भी सांसद रहे। राजनीति में भी उन्होंने वही अनुशासन, वही जिज्ञासा और वही कर्मनिष्ठा दिखाई, जिसने उन्हें शिक्षा जगत का नायक बनाया था।

परंतु डॉ. जिचकर का व्यक्तित्व केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था। वे एक कुशल वक्ता, लेखक, विचारक और संस्कृत के गहरे ज्ञाता भी थे। उनके भाषणों में गहराई के साथ सादगी होती थी। वे युवा पीढ़ी को हमेशा यह संदेश देते थे कि ‘सीमाएँ केवल हमारे मन में होती हैं’, यह वाक्य उनके जीवन का सार था। उन्होंने दिखाया कि अगर जिज्ञासा जीवित हो, तो मनुष्य हर क्षेत्र में असंभव को संभव बना सकता है।

दुर्भाग्यवश, 2 जून 2004 को एक सड़क दुर्घटना में मात्र 49 वर्ष की आयु में यह ज्ञानदीप बुझ गया। पर सच यह है कि ऐसे व्यक्तित्व मरते नहीं, वे समाज के मानस में अमर हो जाते हैं। आज भी जब कोई विद्यार्थी थक कर किताब बंद करता है, तो डॉ. जिचकर का उदाहरण उसे फिर से प्रेरित करता है। जब कोई युवा यह सोचता है कि एक व्यक्ति सब कुछ नहीं कर सकता, तो डॉ. जिचकर का जीवन उसे चुनौती देता है ‘क्यों नहीं?’

उनका जीवन यह सिखाता है कि सफलता केवल ऊँचे पद या धन से नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-विकास से आती है। उन्होंने हर उस सोच को झुठला दिया जो कहती है कि मनुष्य की क्षमताएँ सीमित हैं। असली शिक्षा वही है जो व्यक्ति के भीतर की संभावनाओं को जगा दे। डॉ. श्रीकांत जिचकर एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय थे, एक ऐसा विश्वविद्यालय जो न केवल ज्ञान देता था, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाता था। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और आत्म-सुधार की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

आज जब युवा वर्ग प्रतियोगिता और तनाव के दबाव में दिशा खो रहा है, तब डॉ. जिचकर का जीवन एक मार्गदर्शक प्रकाश की तरह है। उनकी जिज्ञासा, अनुशासन और कर्मनिष्ठा यह बताती है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो मनुष्य अपने जीवन को एक जीवंत किंवदंती में बदल सकता है।

डॉ. जिचकर ने केवल ज्ञान नहीं कमाया, उन्होंने ‘ज्ञान का आदर्श’ बनकर दिखाया। और यही कारण है कि वे केवल महाराष्ट्र या भारत के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के प्रेरक पुरुष हैं। उनका जीवन इस युग के हर विद्यार्थी और नागरिक के लिए यही संदेश छोड़ता है, ‘सीखते रहो, बढ़ते रहो, क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है जिज्ञासा का जीवित रहना।’
-लेखक पेशे से सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




