



शंकर सोनी.
हमारे देश में विदेशी ताकतों ने एक ‘अदृश्य इको-सिस्टम’ बना हुआ है जो देश की अखंडता और एकता को भारी चुनौती है। हमारी मेधा, हमारी नीतियों और हमारी आने वाली पीढ़ियों को बाहरी लोग अपने स्वार्थ हेतु उपयोग में ले रहे हैं पर हमें इसका अहसास नहीं है। हाल ही में सार्वजनिक हुई जेफ्री एपस्टीन फाइल्स और अमेरिकी विश्वविद्यालयों जैसे एमआईटी को मिलने वाली रहस्यमयी विदेशी सहायता की खबरों ने एक बार फिर उस कड़वे सच को उजागर कर दिया है, जिसकी चेतावनी राजीव मल्होत्रा ने अपनी पुस्तकों ‘ब्रेकिंग इंडिया’ और ‘स्नेक्स इन द गंगा’ में दी थी।

राजीव मल्होत्रा स्पष्ट करते हैं कि कैसे पश्चिमी अकादमी भारतीय मेधा का उपयोग करके भारत के ही विरुद्ध नैरेटिव गढ़ रही है। एमआईटी और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में जो शोध हो रहे हैं, उनमें अक्सर ‘विदेशी फंडिंग’ का ऐसा जाल होता है जिसका उद्देश्य भारत की सामाजिक समरसता को खंडित करना है। जब हम ‘एपस्टीन फाइल्स’ जैसे मामलों को देखते हैं, तो समझ आता है कि यह केवल धन का खेल नहीं है, बल्कि ‘प्रभाव की खरीद’ और ब्लैकमेल का एक अंतरराष्ट्रीय तंत्र है।

विडंबना देखिए, आज का ‘पढ़ा-लिखा’ वर्ग उसी बाहरी इको-सिस्टम का हिस्सा बनने में गौरव महसूस करता है जो भारत की जड़ों को खोद रहा है। ‘वोकइज्म’ और ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ जैसे आयातित विमर्शों के माध्यम से भारतीय युवाओं को अपनी ही संस्कृति और इतिहास के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है। ये लोग अनजाने में उन ‘विषधरों’ के जाल में उलझ रहे हैं जिनका लक्ष्य भारत को भीतर से खोखला करना है।

एफसीआरए के माध्यम से आने वाला विदेशी चंदा केवल एनजीओ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे बौद्धिक विमर्श को भी नियंत्रित कर रहा है। एपस्टीन फाइल्स में भारतीय नामों का आना और सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में याचिका दायर होना यह दर्शाता है कि यह मकड़जाल कितना गहरा है। निःसंदेह देश में भ्रष्ट और कुंठित व्यवस्था है जिसके विरुद्ध जागृत लोग संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं। यह बाहरी इको-सिस्टम ऐसे लोगों को सम्मोहित कर अपने जाल में फसाता है। जाल में फंसे लोगों को यह सिस्टम न केवल आर्थिक सहायता करता है बल्कि ऐसे मुद्दे भी देता है जिन्हें उठा कर तथाकथित सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता देश को कमजोर करने में लग जाते हैं।

इस जाल में उलझते लोग वास्तव में उस मानसिक दासता का शिकार हैं, जहाँ वे विदेशी प्रमाणपत्रों और पुरस्कारों के मोह में अपनी राष्ट्रीय पहचान को भूल चुके हैं। यदि हमें भारत को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करना है, तो हमें भारतीय सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम शहीदों और क्रांतिवीरों के संघर्ष से प्रेरणा लेनी होगी।

विदेशी चंदे से संचालित बौद्धिक नैरेटिव्स को पहचानना होगा। अपनी स्वदेशी दृष्टि को विकसित करना होगा। हमें तय करना होगा कि हम भारत के निर्माण में ‘क्रांतिवीर’ बनेंगे या विदेशी हितों के लिए काम करने वाले ‘मोहरे’ राजीव मल्होत्रा की पुस्तकें बताती हैं कि आजादी के बाद हमारे इतिहास का विरूपण किया गया और यह भी समझाती है कि कैसे विदेशी एजेंसियां और ‘बौद्धिक सांप’ भारत के गौरव को मिटाकर उसे एक ‘असफल राष्ट्र’ के रूप में पेश करते हैं। यही काम हमारे इतिहास के साथ हुआ। आजादी के बाद सशस्त्र क्रांति के महत्वपूर्ण योगदान को इतिहास से गायब करना एक सोची-समझी ‘बौद्धिक साजिश’ का हिस्सा था। फिरंगिकाल में हमारे देश में अंग्रेजी राज बनाए रखने में जो भूमिका लंबे समय तक हम निभाते रहे आज वही भूमिका कुछ संस्थान और लोग निभा रहे हैं जिनका वर्णन ‘ब्रेकिंग इंडिया’ में ‘विदेशी फंडिंग’ प्राप्त करने वालों के रूप में किया गया है। निश्चित रूप से, ‘विदेशी हस्तक्षेप’ को रोकने के लिए एफसीआरए में ऐतिहासिक संशोधन (2020) विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में संशोधन कर विदेशी धन के बेलगाम प्रवाह पर नकेल कसी गई है। अब विदेशी चंदे का उपयोग केवल उसी कार्य के लिए किया जा सकता है जिसके लिए वह लिया गया है।

‘प्रशासनिक खर्चों’ की सीमा को 50 फीसद से घटाकर 20 फीसद करना एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने उन लोगों की कमर तोड़ दी जो विदेशी धन पर ‘ऐयाशी’ और ‘एजेंडा’ चलाते थे। गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने वाले 19,000 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए हैं। इसमें एम्नेस्टी इंटरनेशनल और ग्रीनपीस जैसे बड़े नाम शामिल हैं, जो अक्सर विकास कार्यों में बाधा डालने या भारत विरोधी नैरेटिव गढ़ने के आरोपी रहे हैं।

हाल ही में ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ जैसे थिंक-टैंक पर की गई कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि अब ‘बौद्धिक विमर्श’ के नाम पर विदेशी एजेंडा नहीं चलेगा। अब भारत विदेशी रेटिंग एजेंसियों के सामने हाथ नहीं जोड़ता, बल्कि डेटा के साथ उन्हें श्कोर्स करेक्शनश् के लिए मजबूर करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा के उस ‘मैकाले मॉडल’ को बदला जा रहा है जिसका उपयोग बाहरी इको-सिस्टम भारतीय युवाओं को अपनी संस्कृति से काटने के लिए करता था। यह नीति उस बौद्धिक गुलामी का तोड़ है। हमें सतर्क रहना होगा, क्योंकि जब तक हमारे देश के भीतर ‘बाहरी इको-सिस्टम’ के प्रति आकर्षणबनाएं रखेंगे, तब तक बाहरी ताकतें हमें उलझाती रहेंगी।




