



गोपाल झा.
औद्योगिक निवेश के लिए ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें भरोसा हो, संवाद हो और भविष्य को लेकर स्पष्ट दृष्टि हो। उद्योग तब फलता-फूलता है जब प्रशासन सहयोगी हो, जनप्रतिनिधि जिम्मेदार हों और जनता को यह विश्वास हो कि विकास ‘उनकी कीमत’ पर नहीं, ‘उनके साथ’ मिलकर हो रहा है। इस कसौटी पर राजस्थान लंबे समय से एक अनुकूल राज्य माना जाता रहा है। यहां की नौकरशाही हो या राजनीतिक नेतृत्व, निवेश के प्रति सहयोग का भाव रहा है और आम जनता ने भी कभी आंख मूंदकर विरोध की परंपरा नहीं अपनाई। इसी पृष्ठभूमि में टिब्बी में प्रस्तावित एथनॉल प्लांट के मैनेजर जेपी शर्मा का यह बयान कि ‘राजस्थान में विरोध और अनिश्चितता के कारण वे यहां प्लांट नहीं लगाना चाहते’, न सिर्फ असंतुलित है बल्कि सच्चाई से भी परे है।

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि सरकार ने इस परियोजना के लिए असाधारण स्तर तक संरक्षण दिया। विरोध के बीच पुलिस पहरे में निर्माण कार्य शुरू कराया गया। प्रशासनिक मशीनरी को महीनों तक मौके पर तैनात रखा गया। कानून-व्यवस्था के नाम पर लाखों रुपये खर्च हुए, वह भी सिर्फ इसलिए कि एक निजी कंपनी का काम बिना रुकावट चलता रहे। ऐसे में यह कहना कि राजस्थान में निवेश का माहौल नहीं है, उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करना है जिसने कंपनी को हरसंभव सुविधा और सुरक्षा उपलब्ध कराई। सवाल यह नहीं है कि सरकार ने क्या नहीं किया, बल्कि यह है कि कंपनी ने क्या समझने से इनकार किया।
जनता की मांग कोई उग्र या अव्यवहारिक नहीं थी। न तो उद्योग को भगाने की साजिश थी और न विकास को रोकने का हठ।

मांग सिर्फ इतनी थी कि पर्यावरणीय खतरों और उनके दीर्घकालिक दुष्परिणामों को गंभीरता से लिया जाए। जिस स्थान पर एथनॉल प्लांट लगाया जा रहा था, वह क्षेत्र की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि है, धान का कटोरा, चारों ओर आबादी, और जीवन पूरी तरह खेती पर निर्भर। ऐसे स्थान का चयन ही कंपनी की अदूरदर्शिता को उजागर करता है। उद्योग के लिए जमीन चुनते समय सिर्फ नक्शा नहीं देखा जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वहां रहने वालों की सांस, पानी और मिट्टी पर उसका क्या असर पड़ेगा। यहां यह संतुलन पूरी तरह गायब था।

उपलब्ध आंकड़े इस आशंका को और गहरा करते हैं। रोजाना लगभग 60 लाख लीटर भूजल का दोहन, 4400 क्विंटल राख का उत्पादन, 925 टन कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन। ये आंकड़े किसी रिपोर्ट की सूखी पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों के भविष्य पर मंडराता खतरा हैं। जिस इलाके में पहले से जल संकट, प्रदूषण और बीमारियों की समस्या है, वहां इस स्तर का संसाधन दोहन स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करेगा। सवाल सीधा है, क्या कंपनी ने यह गारंटी दी कि आम लोगों की सेहत पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा? अगर नहीं, तो फिर ऐसे प्रयोग की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

असल विफलता यहीं हुई कि कंपनी जनता का भरोसा नहीं जीत सकी। संवाद के बजाय जिद, सहमति के बजाय सत्ता का सहारा लिया गया। यह मान लिया गया कि सरकारी अनुमति मिलते ही सामाजिक स्वीकृति अपने आप मिल जाएगी। यही सबसे बड़ी भूल थी। लोकतंत्र में सरकारें जनता की ताकत से चलती हैं, जनता सरकार की ‘बैसाखी’ नहीं होती। टिब्बी का आंदोलन इसी जागरूकता का परिणाम था। जनता जागी, एकजुट हुई और उसने दृढ़ स्वर में अपनी बात रखी। नतीजा सबके सामने है। अब इस असफलता का दोष राजस्थान या सरकार पर मढ़ना, आत्ममंथन से बचने की कोशिश भर है।

यह भी सच है कि औद्योगिक विकास की जरूरत से कोई इनकार नहीं करता। हनुमानगढ़ जिले में संभावनाओं की कमी नहीं है। बंद पड़ी स्पिनिंग मिल को पुनर्जीवित किया जाए तो हजारों हाथों को काम मिल सकता है। क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप शुगर मिल स्थापित हो तो गन्ना उत्पादन और किसान की आय दोनों बढ़ सकते हैं। कृषि आधारित उद्योग यहां के लिए स्वाभाविक विकल्प हैं। दुर्भाग्य यह है कि जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और दूरदृष्टि के अभाव में इन संभावनाओं पर गंभीरता से काम नहीं हो सका।

जिले की जनता उद्योग-विरोधी नहीं है, वह केवल जीवन-विरोधी विकास के खिलाफ है। आज पर्यावरण प्रदूषण कोई सैद्धांतिक बहस नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई बन चुका है। हनुमानगढ़ धीरे-धीरे कैंसर बेल्ट की पहचान की ओर बढ़ रहा है। न पीने को शुद्ध पानी, न सांस लेने को साफ हवा। ऐसे हालात में किसी भी नए प्रदूषणकारी उद्योग को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह डर नहीं, समझदारी है।
अब जबकि कंपनी ने पत्र लिखकर पीछे हटने का संकेत दिया है, सरकार का अगला कदम क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि हनुमानगढ़ और राजस्थान को बदनाम करने वाली बयानबाजी स्वीकार्य नहीं हो सकती। उद्योग चाहिए, विकास चाहिए, लेकिन ऐसा जो धरती, पानी और इंसान तीनों के साथ न्याय करे। यही संतुलन सच्चे विकास की पहचान है, और इसी की मांग टिब्बी की जनता ने की है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं


