

गोपाल झा.
हनुमानगढ़ नगरपरिषद चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी दूर हो, लेकिन शहर की सियासत ने पहले ही चुनावी चाल चलनी शुरू कर दी है। हालात ऐसे बन चुके हैं मानो आचार संहिता चुपचाप शहर में दाखिल हो गई हो। गली-मोहल्लों से लेकर चाय की दुकानों तक राजनीति का तापमान चढ़ा हुआ है। हर मेज पर संभावित प्रत्याशियों के नाम हैं, हर बातचीत में वोटों का गणित है और नेताओं के ड्राइंग रूम एक बार फिर मिनी सचिवालय का रूप ले चुके हैं। इस बार का नगरपरिषद चुनाव इसलिए अलग है क्योंकि यह परंपरा नहीं, प्रयोग की जमीन पर लड़ा जाएगा। अब तक हनुमानगढ़ की राजनीति दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटी रही, एक ओर भाजपा के कद्दावर चेहरा डॉ. रामप्रताप और दूसरी ओर कांग्रेस के अनुभवी नेता चौधरी विनोद कुमार। सत्ता और विपक्ष की यह सीधी लड़ाई वर्षों से चली आ रही थी, जिसमें मतदाता भी इन्हीं दो विकल्पों के बीच फैसला करता रहा। लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिख रही है। विधायक गणेशराज बंसल का उभरता हुआ प्रभाव इस चुनाव को त्रिकोणीय बना चुका है। यह तीसरा केंद्र न सिर्फ संतुलन बिगाड़ रहा है, बल्कि दोनों परंपरागत ध्रुवों की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर रहा है। अब मुकाबला सिर्फ पार्टी बनाम पार्टी नहीं, बल्कि प्रभाव, पकड़ और स्थानीय समीकरणों की परीक्षा बन गया है।

नगरपरिषद चुनाव अब विकास, संगठन और व्यक्तिगत प्रभाव, तीनों का टेस्ट बनने जा रहा है। यही वजह है कि यह चुनाव दिलचस्प भर नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से विस्फोटक माना जा रहा है। हनुमानगढ़ की सियासत एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां हर चाल भविष्य की दिशा तय करेगी।

कहने को गणेशराज बंसल निर्दलीय विधायक हैं, लेकिन विधानसभा पहुंचने से पहले ही उन्होंने भाजपा को समर्थन दे दिया था। इस लिहाज से वे भाजपा समर्थित विधायक माने जाते हैं। दिलचस्प यह है कि स्थानीय भाजपा नेतृत्व से उनकी अदावत किसी से छुपी नहीं है। ‘36 का आंकड़ा’ वाली कहावत यहां पूरी सियासी गरिमा के साथ लागू होती है। पार्टी नेतृत्व ने कई बार खाई पाटने की कोशिश की, लेकिन ज़मीन पर बर्फ नहीं पिघली। नतीजा यह कि भाजपा अब एक पार्टी होकर भी दो खेमों में बंटी नजर आती है, एक अमित सहू का, दूसरा गणेशराज बंसल का।

अगर पीछे पलटें तो 2018 का नगरपरिषद चुनाव मौजूदा हालात की कुंजी है। तब गणेशराज बंसल कांग्रेस में थे। उन्होंने तत्कालीन विधायक चौधरी विनोद कुमार का भरोसा जीतकर पूरा चुनावी गणित अपने हिसाब से सेट किया। माना जाता है कि उन्हें चेयरमैन पद के लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ पहले ही मिल चुका था। यानी कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से उन्हें फ्री हैंड था। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर शहर की सरकार बनाई, जबकि भाजपा 18 सीटों पर सिमट गई। उस चुनाव में गणेशराज बंसल सिर्फ उम्मीदवार नहीं थे, बल्कि पूरी रणनीति के आर्किटेक्ट थे।

बतौर चेयरमैन उनके कार्यकाल को समर्थक आज भी ‘स्वर्णकाल’ बताते हैं। सड़कों से लेकर नालियों तक, पार्कों से लेकर भवनों तक, कई विकास कार्य हुए। इसी वजह से उन्हें ‘विकास पुरुष’ की उपाधि दी गई। संयोग देखिए, भाजपा नेता डॉ. रामप्रताप को पहले ही उनके समर्थक ‘विकासदूत’ कह चुके थे। इस तरह हनुमानगढ़ विधानसभा क्षेत्र में दो विकास ब्रांड खड़े हो गए, विकासदूत और विकास पुरुष। राजनीति में ब्रांडिंग भी उतनी ही अहम होती है जितनी जमीनी पकड़।

हालांकि हर चमक के पीछे साया भी होता है। गणेशराज बंसल के कार्यकाल में नगरपरिषद ने रिकॉर्ड भूखंड बेचे। आय के स्थायी स्रोत विकसित करने की बात कई बार उठी, लेकिन फाइलों में ही दम तोड़ती रही। आज हालत यह है कि नगरपरिषद की वित्तीय स्थिति डांवाडोल है। मेंटिनेंस के लिए भी बजट का इंतजार करना पड़ता है। अधिकारी सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं, जैसे बारिश का इंतजार करते किसान। लेकिन राजनीति में याददाश्त चयनात्मक होती है। समर्थकों को विकास दिखता है, आलोचकों को बिक्री।

नगरपरिषद के निवर्तमान बोर्ड की सबसे दिलचस्प खासियत यह रही कि यहां भाजपा-कांग्रेस की दीवारें लगभग गिर गईं। जब गणेशराज बंसल ने कांग्रेस छोड़ी तो अधिकांश कांग्रेसी पार्षद भी उनके साथ हो लिए। यहां तक कि चौधरी विनोद कुमार और डॉ. रामप्रताप के के करीबी माने जाने वाले पार्षद भी बंसल खेमे में नजर आने लगे। इस तरह नगरपरिषद की अंदरूनी राजनीति ने विधानसभा सीट का समीकरण ही पलट दिया। यह वही क्षण था जब हनुमानगढ़ की राजनीति ने करवट बदली।
विधायक बनने के बाद गणेशराज बंसल ने अपने खास सिपहसालार सुमित रणवां को सभापति बनवाने में सफलता पाई। भाजपा प्रत्याशी रहे अमित सहू ने भी अपने पसंदीदा पार्षद को कुर्सी पर बैठाने की कोशिश की, लेकिन बाजी बंसल खेमा ले गया। फिर उपसभापति अनिल खीचड़ के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव आया। 59 में से 53 पार्षद एकतरफा अनिल खीचड़ के खिलाफ खड़े हो गए। यह सिर्फ एक प्रस्ताव नहीं था, यह शक्ति प्रदर्शन था। संदेश साफ था, नगरपरिषद की बागडोर किसके हाथ में है।

लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता। सभापति बनने के बाद सुमित रणवां, बतौर चेयरमैन गणेशराज बंसल की कार्यशैली को निभा नहीं पाए। यहीं से ‘सियासी फिसलन’ शुरू हुई। पार्षदों में नाराजगी बढ़ी, आम जनता में असंतोष उभरा। शिकायतें बढ़ीं, फाइलें अटकने लगीं। यह सब विधायक तक पहुंचा, लेकिन उन्होंने निर्धारित कार्यकाल का हवाला देकर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। आखिरकार, कार्यकाल खत्म हो गया और पिछले साल भर से नगरपरिषद प्रशासक के हवाले है। एडीएम उम्मेदीलाल मीणा फिलहाल नगरपरिषद के सर्वेसर्वा हैं।

अब जब चुनाव की सरगर्मी शुरू हो गई है, तो नगरपरिषद की राजनीति सचमुच तिराहे पर खड़ी है। एक तरफ कांग्रेस के चौधरी विनोद कुमार हैं, जिनकी टिकट वितरण में भूमिका स्वाभाविक रूप से बड़ी होगी। दूसरी तरफ भाजपा दो हिस्सों में बंटी है, अमित सहू और गणेशराज बंसल। तीसरा धु्रव खुद गणेशराज बंसल हैं, जिनके साथ इस वक्त शहर के अधिकांश धुरंधर खड़े नजर आते हैं, चाहे वे भाजपा के हों या कांग्रेस के। यही सबसे रोचक पहलू है। पार्टी से ज्यादा व्यक्ति केंद्र में है। कई निवर्तमान पार्षद पसोपेश में हैं। उन्हें पता है कि चुनाव जीतने के लिए टिकट सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी है। लेकिन चाबी किस ताले की है, अमित सहू की चौखट या गणेशराज बंसल की देहरी, यह तय करना आसान नहीं। पार्टी छोड़ना आसान नहीं, पार्टी में रहकर बागी बनना भी जोखिम भरा है। इस दोराहे पर खड़े पार्षद इस चुनाव के असली खिलाड़ी होंगे।

कांग्रेस की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं। चौधरी विनोद कुमार के पास संगठनात्मक अनुभव है, लेकिन उनकी निष्क्रियता पार्टी को खोई हुई प्रतिष्ठा दिला पाएगी, संशय है। चौधरी विनोद कुमार के कई पुराने सिपहसालार अब बंसल खेमे में हैं। उन्हें नए चेहरों पर भरोसा करना पड़ेगा या पुराने रिश्ते जोड़ने होंगे, यह दुविधा कांग्रेस की रणनीति तय करेगी। भाजपा के लिए चुनौती और बड़ी है। एक ही पार्टी में दो पावर सेंटर, दोनों के अपने समर्थक, दोनों के अपने दावे। टिकट वितरण में जरा सी चूक पार्टी को भारी पड़ सकती है।



