




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
हनुमानगढ़ की गलियों में पले-बढ़े रिटायर्ड कर्नल राजेंद्र प्रसाद को देखकर आज कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि इस शांत चेहरे के पीछे कितनी युद्ध की रातें, कितनी गोलियों की आवाज़ें और कितनी प्यास से जूझती टुकड़ियों की यादें दबी हैं। लेकिन जैसे ही वे बोलना शुरू करते हैं, रेगिस्तान की हवा में बारूद की गंध तैरने लगती है। वे 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के गवाह ही नहीं, हिस्सेदार रहे हैं। और हिस्सेदार भी ऐसे, जिन्होंने बंदूक से ज्यादा पाइप पकड़ा। दुश्मन पर गोली चलाने से ज्यादा अपने जवानों तक पानी पहुंचाने की लड़ाई लड़ी। हनुमानगढ़ जैसे सीमावर्ती जिले के लोग सीमा की कीमत जानते हैं। यहां युद्ध खबर नहीं होता, अनुभव होता है। शायद इसी मिट्टी ने टिवर को सिखाया कि देश की सेवा सिर्फ मोर्चे पर नहीं, व्यवस्था में भी होती है।

1963 में सेकंड लेफ्टिनेंट बनकर सेना जॉइन करने वाले राजेंद्र प्रसाद, 57 इंजीनियरिंग रेजीमेंट में तैनात हुए। इंजीनियरिंग कोर यानी वह दस्ता जो युद्ध से पहले रास्ता बनाता है, युद्ध के दौरान व्यवस्था संभालता है और युद्ध के बाद फिर से सब खड़ा करता है। साल 1965 का युद्ध उनके लिए पहला असली इम्तिहान था। उस समय युद्ध क्षेत्र में पानी पहुंचाना किसी मिशन से कम नहीं था। न टैंकर, न आधुनिक साधन। सिर्फ पुराने कुएं, कुछ पंप और जवानों की हिम्मत।

कर्नल राजेंद्र प्रसाद ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ को बताते हैं, ‘रेलवे स्टेशनों के पास बड़े कुएं होते थे। हमने वहीं से पानी निकालने की योजना बनाई। पहली बार सबमर्सिबल पंप लगाए। पाइपलाइन बिछाई और करीब 30 हजार जवानों तक पानी पहुंचाया।’ आज यह तकनीक सामान्य लगती है, लेकिन उस समय यह सोच ही नई थी।

हनुमानगढ़ के किसान जानते हैं कि रेगिस्तान में पानी क्या मायने रखता है। वही संघर्ष युद्ध में कई गुना हो जाता है। कर्नल राजेंद्र प्रसाद कहते हैं, ‘बिना पानी के सेना एक कदम नहीं बढ़ती। गोली बाद में चलती है, पहले पानी चाहिए।’ 1971 का युद्ध और भी कठिन था। भारतीय सेना पाकिस्तान की सीमा में 56 किलोमीटर अंदर तक पहुंच चुकी थी। मोर्चा आगे बढ़ चुका था, लेकिन सप्लाई पीछे अटकी हुई थी। ऐसे में पानी पहुंचाना सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया।

फिर वही पुराने रेलवे कुएं काम आए। वहां से पानी निकाला गया, सबमर्सिबल पंप लगाए गए और करीब 70 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। यह सब दुश्मन की गोलाबारी के बीच। दिन-रात काम, बिना शोर, बिना रोशनी। कई बार पाइप टूट जाती थी। रात में जाकर जोड़नी पड़ती थी। डर लगता था, लेकिन प्यासे जवान याद आते ही पैर अपने आप चल पड़ते थे। यह वाक्य हनुमानगढ़ के हर उस परिवार को छूता है, जिसने सीमा पर किसी अपने को भेजा है।

कर्नल राजेंद्र प्रसाद सात बहनों में अकेले भाई हैं। पिता सेल्स टैक्स में कमिश्नर थे। राजेंद्र प्रसाद सेना जॉइन करने वाले परिवार के पहले व्यक्ति हैं। परिवार चाहता था कि वे वर्दी पहनें। उन्होंने न सिर्फ वर्दी पहनी, बल्कि उसे निभाया भी। 30 साल की सेवा के बाद 1993 में सेवानिवृत्त हुए, लेकिन हनुमानगढ़ लौटकर भी उनका रिश्ता सेना से टूटा नहीं है। आज जब वे टाउन की सड़कों पर चलते हैं, तो शायद बहुत से लोग नहीं जानते कि यही आदमी कभी गोलियों के बीच खड़ा होकर पानी की पाइप जोड़ रहा था। यही आदमी हजारों जवानों की प्यास बुझाने का जिम्मा उठाए हुए था। थल सेना दिवस पर दिल्ली में परेड होती है, टीवी पर झांकियां नजर आती हैं। लेकिन असली परेड तो उन हाथों की होती है, जो खून और पसीने से व्यवस्था खड़ी करते हैं। असली तिरंगा तो उन पाइपों पर लहराता है, जिनसे जवानों तक पानी पहुंचता है। कर्नल राजेंद्र प्रसाद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं, यह हनुमानगढ़ की मिट्टी की कहानी है। यह उस जिले का गौरव है, जहां सीमा पास है और दिल बड़ा। यह कहानी गोली की नहीं, गिलास की है। यह वीरता की नहीं, व्यवस्था की है। और शायद यही सबसे बड़ी देशभक्ति है, जहां पहले प्यास बुझाई जाती है, फिर इतिहास लिखा जाता है।



