



मिताली अग्रवाल.
हर नया साल अपने साथ नई उम्मीदें और नए संकल्प लेकर आता है। लेकिन असली बदलाव तब आता है जब सोच बदलती है। ‘सशक्त नारी’ की सोच यही है कि बदलाव की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से हो। हमारे समाज में महिला को बचपन से यही सिखाया जाता है कि वह समायोजन करे, सहन करे और खुद को सबसे अंत में रखे। परिवार, रिश्ते और जिम्मेदारियों के बीच वह अपनी पहचान को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देती है। वह अपनी सेहत को टाल देती है, अपने सपनों को छोटा कर लेती है और कई बार अन्याय को भी चुपचाप स्वीकार कर लेती है।
‘सशक्त नारी’ होना जिम्मेदारियों से भागना नहीं है।
‘सशक्त नारी’ होना है, खुद को भी उतनी ही अहमियत देना, जितनी वह दूसरों को देती है। महिला अक्सर अपनी सेहत को ‘बाद में देखेंगे’ वाली सूची में डाल देती है। परिवार की जरूरतें पहले, बच्चों की चिंता पहले और खुद की थकान, दर्द और मानसिक तनाव आखिर में।

‘सशक्त नारी’ यह समझती है कि उसकी सेहत कोई विकल्प नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। शारीरिक सेहत के साथ-साथ मानसिक शांति भी जरूरी है। तनाव, डर और दबाव को छिपाना मजबूती नहीं, बल्कि समय पर मदद मांगना ही समझदारी है। एक स्वस्थ महिला ही आत्मविश्वास के साथ परिवार और समाज दोनों को संभाल सकती है।
आज भी खेलों को महिलाओं के लिए ‘ज़रूरी नहीं’ समझा जाता है। लेकिन ‘सशक्त नारी’ जानती है कि खेल सिर्फ शरीर को नहीं, सोच को भी मजबूत बनाते हैं। दौड़ना, योग करना, साइकिल चलाना या किसी भी खेल से जुड़ना, यह आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की दिशा में कदम है।

जब महिला अपने शरीर पर भरोसा करना सीखती है, तब वह जीवन के फैसलों में भी मजबूती से खड़ी होती है। महिलाओं के शौक अक्सर फुर्सत की चीज़ मान लिए जाते हैं। लेकिन ‘सशक्त नारी’ के लिए शौक उसकी पहचान का हिस्सा होते हैं। लिखना, गाना, नृत्य, पेंटिंग या कोई भी रचनात्मक काम, ये उसे खुद से जोड़ते हैं। शौक महिला को खुशी देते हैं, उसकी सोच को नया आकार देते हैं और कई बार आत्मनिर्भरता का रास्ता भी खोलते हैं। अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं, बल्कि संतुलित जीवन की जरूरत है।

अक्सर कहा जाता है कि समय बदल रहा है। लेकिन समय तभी बदलता है जब महिला अपनी आवाज़ को पहचानती है। ‘सशक्त नारी’ अपने अधिकारों को जानती है, सवाल पूछती है और जरूरत पड़ने पर मदद मांगती है।
अन्याय के खिलाफ बोलना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की निशानी है। कानून, जानकारी और जागरूकता, ये तीनों महिला को सशक्त बनाते हैं।
इस नए साल में सबसे जरूरी संकल्प यही होना चाहिए कि महिला खुद को आखिरी विकल्प नहीं, पहली प्राथमिकता माने। जब महिला खुद को पहले रखती है, तब वह स्वार्थी नहीं बनती, वह और अधिक सक्षम, आत्मनिर्भर और मजबूत बनती है। क्योंकि ‘सशक्त नारी’ आगे बढ़ेगी, तभी परिवार आगे बढ़ेगा। और जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी समाज सच में प्रगति करेगा।
-लेखिका ‘सशक्त नारी संस्थान’ की संस्थापक अध्यक्ष हैं


