



भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
लोकसभा में नरेगा संशोधन विधेयक-2025 पर हुई बहस के दौरान सीकर से सीपीआई(एम) सांसद अमराराम ने केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सुनियोजित तरीके से ग्रामीण मजदूरों का अधिकार छीनने की दिशा में आगे बढ़ रही है और मनरेगा को कमजोर कर गरीबों के रोजगार पर कुठाराघात किया जा रहा है। अमराराम ने सरकार से नरेगा को ‘रिप्लेस’ करने वाले कथित जी-राम-जी विधेयक को तुरंत वापस लेने या इसे सलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की।

सांसद अमराराम ने बहस की शुरुआत ही सख्त तेवरों के साथ की। उन्होंने कहा कि खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक मशीनीकरण तेजी से बढ़ चुका है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों के सामने रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ऐसे हालात में मनरेगा गरीब मजदूरों के लिए जीवनरेखा है, लेकिन केंद्र सरकार उसी को कमजोर करने पर तुली हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार रोजगार देने के बजाय गरीबों से रोजगार छीनने का काम कर रही है।

अमराराम ने अपने भाषण में भाजपा पर तीखा तंज कसा। उन्होंने कहा, ‘यह सरकार महात्मा गांधी के रास्ते पर नहीं, बल्कि गोडसे की तपस्या कर रही है।’ इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने सरकार की नीतियों को गांधी के ग्राम स्वराज और गरीब कल्याण के विचारों के विपरीत बताया। सदन में यह बयान राजनीतिक हलकों में खासा चर्चित रहा।

उन्होंने नरेगा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए कहा कि यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में जब ग्रामीण मजदूरी में गिरावट आई थी, तब ग्रामीण मजदूरों को रोजगार की गारंटी देने के लिए नरेगा कानून बनाया गया। इस कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को न्यूनतम 100 दिन का रोजगार देने का प्रावधान किया गया था। अमराराम ने आरोप लगाया कि भाजपा की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है और वह नरेगा के मूल प्रावधानों से लगातार दूर भाग रही है।

सांसद ने केंद्र सरकार के वित्तीय फैसलों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले मनरेगा मजदूरों की पूरी मजदूरी केंद्र सरकार वहन करती थी, लेकिन अब इसे 60-40 के अनुपात में केंद्र और राज्य सरकारों पर डालने की तैयारी की जा रही है। इससे राज्यों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और अंततः इसका नुकसान मजदूरों को ही होगा। उन्होंने इसे संघीय ढांचे के साथ-साथ गरीब विरोधी कदम बताया। अमराराम ने बजट आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024-25 के बजट में नरेगा के कुल मजदूरों में से केवल 5 प्रतिशत को ही 100 दिन का काम मिला। सरकार एक तरफ 125 दिन काम देने की बात कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों को काम ही नहीं दिया जा रहा। उन्होंने इसे ‘ढकोसला’ करार दिया। उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां राज्य सरकार ने मजदूरों के लिए कल्याण बोर्ड बनाया है, जिससे श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा मिलती है। अमराराम ने सवाल उठाया कि भाजपा और उसकी समर्थित राज्य सरकारें अन्य राज्यों में ऐसे कल्याण बोर्ड क्यों नहीं बनातीं। उनके मुताबिक यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।

अमराराम ने नरेगा बजट में भारी कटौती को भी गरीब विरोधी नीति बताया। उन्होंने कहा कि पहले मनरेगा के लिए 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान था, लेकिन महंगाई बढ़ने के बावजूद बजट घटाकर 68 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि नरेगा को कमजोर नहीं, बल्कि और समृद्ध करने की जरूरत हैकृमजदूरी बढ़ाने की जरूरत है। इसके उलट सरकार जो थोड़ा-बहुत मजदूरों को मिल रहा था, उसे भी छीनने का काम कर रही है। अपने भाषण के अंत में अमराराम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार गांव के गरीब मजदूरों का हक छीन रही है। उन्होंने मांग की कि नरेगा संशोधन विधेयक-2025 को या तो वापस लिया जाए या फिर व्यापक विचार-विमर्श के लिए सलेक्ट कमेटी को भेजा जाए। संसद में उनका यह भाषण नरेगा को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच गहराते राजनीतिक टकराव का संकेत माना जा रहा है।


