



भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में देर रात हुए व्यापक प्रशासनिक फेरबदल को सिर्फ रूटीन सरकारी प्रक्रिया मान लेना सच से मुंह मोड़ना जैसा होगा। नए मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास के कार्यभार संभालते ही मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की पूरी टीम में जो बदलाव किए गए हैं, वे साफ संकेत देते हैं कि सरकार अपनी प्रशासनिक संरचना को नए सिरे से राजनीतिक जरूरतों के मुताबिक ढाल रही है। इसे सुधांश पंत के केंद्र में डेपुटेशन पर जाने के बाद बदले पावर-बैलेंस के रूप में भी देखा जा रहा है।

सबसे बड़ा मैसेज मुख्यमंत्री के एसीएस शिखर अग्रवाल को हटाकर उद्योग विभाग भेजने से गया है। यह कदम बताता है कि सीएमओ अब एक बिल्कुल नई टीम के साथ आगे की रणनीति तय करना चाहता है। अखिल अरोड़ा को जलदाय विभाग से निकालकर सीधे मुख्यमंत्री का एसीएस बनाना दर्शाता है कि सरकार भरोसे और तालमेल के आधार पर अपनी कोर टीम तैयार कर रही है। यह बदलाव नीति-निर्माण की सीधी लाइन को दुरुस्त करने जैसा है, जो राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

पर्यटन, कला-संस्कृति विभाग से राजेश यादव को बाहर करके उन्हें एचसीएम रिपा भेजना भी राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ कदम है। यह फैसला बताता है कि उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी को मिले विभागों में प्रशासनिक ढांचे को नया संतुलन देने की कोशिश हो रही है। सरकार शायद इन संवेदनशील विभागों को अब अधिक आक्रामक तरीके से बढ़ाने की रणनीति बना रही है।

इसके साथ-साथ कई बड़े विभागों का एक ही अफसर के पास जमा होना भी सत्ता की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। प्रवीण गुप्ता को पीडब्ल्यूडी के साथ पर्यटन, कला-संस्कृति, आरटीडीसी और आमेर विकास प्राधिकरण की अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ मिलना इस बात का संकेत है कि सरकार अपने भरोसेमंद अधिकारियों पर मल्टी-डिपार्टमेंट मॉडल लागू कर रही है। यह मॉडल राजनीतिक रूप से तभी अपनाया जाता है जब शासन को तेज, नियंत्रित और जवाबदेह बनाना हो।

स्वास्थ्य विभाग में गायत्री राठौड़ को प्रमोशन देकर मेडिकल एजुकेशन का प्रभार देना भी आने वाले राजनीतिक मौसम को देखते हुए अहम कदम माना जा रहा है। स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार और डॉक्टरों की नियुक्तियों से जुड़ी फाइलें चुनावी वर्ष में बेहद राजनीतिक रंग लेती हैं। कोटा और भरतपुर दोनों संभागों में बड़े स्तर पर किए गए तबादले भी राजनीतिक संदेश देते हैं। इन क्षेत्रों का राजनीतिक समीकरण आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकता है, इसलिए वहां प्रशासनिक ढांचा मजबूत और राजनीतिक रूप से सुगठित बनाने की कोशिश दिखती है।

आईटी, ऊर्जा, खाद्य, सहकारिता, पंचायतीराज जैसे जमीनी विभागों में बड़े स्तर पर फेरबदल से यह भी साफ होता है कि सरकार प्रशासनिक ढीलापन खत्म कर तेज-तर्रार कार्यशैली लागू करना चाहती है। चार एपीओ अफसरों को पुनः जिम्मेदारी देना भी राजनीतिक संकेत है, सरकार दिखाना चाहती है कि वह ‘डिसिप्लिन’ और ‘रिजल्ट’ वाले अफसरों को फिर से सिस्टम में लाने के मूड में है।

कुल मिलाकर, इस फेरबदल में तकनीक से लेकर तहसील स्तर तक हर परत पर सत्ता का हस्ताक्षर दिखता है। यह सिर्फ मेज़-बदल की कवायद नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों से भरी रणनीतिक चाल है, सरकार आने वाले महीनों में तेज़, केंद्रीकृत और नियंत्रित प्रशासनिक स्क्रिप्ट पर काम करना चाहती है।



