




डॉ. संतोष राजपुरोहित.
बजट केवल सरकार की आय-व्यय तालिका नहीं होता, वह राज्य के भविष्य का खाका होता है। जब सरकार बजट से पहले जनता से सुझाव मांगती है, तब लोकतंत्र काग़ज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरता है। राजस्थान जैसे विशाल, विविध और संभावनाओं से भरे राज्य में यह प्रक्रिया और भी अर्थपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहाँ की आर्थिक चुनौतियाँ, सामाजिक संरचना और क्षेत्रीय ज़रूरतें एक-सी नहीं हैं। आने वाला बजट इस सवाल का जवाब देगा कि विकास की रफ्तार को बनाए रखते हुए रोजगार, कृषि, जल और ऊर्जा जैसी बुनियादी चुनौतियों से कैसे निपटा जाए। इसलिए यह बजट सिर्फ़ आंकड़ों का हिसाब नहीं, बल्कि इस बात की परीक्षा है कि क्या शासन सचमुच जनता की आवाज़ को नीति में बदल पा रहा है।

राजस्थान सरकार द्वारा आगामी बजट के लिए जनता से सुझाव आमंत्रित करना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की परिपक्वता का संकेत है। बजट ऐसा दस्तावेज होता है जो आने वाले पूरे वर्ष की आर्थिक और सामाजिक दिशा तय करता है। राजस्थान जैसे बड़े और विविध राज्य में बजट का स्वरूप तभी प्रभावी हो सकता है जब वह ज़मीनी सच्चाइयों, क्षेत्रीय असमानताओं और आम नागरिक की रोज़मर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए।

वर्तमान में राजस्थान की अर्थव्यवस्था लगभग 20 लाख करोड़ रुपये के सकल राज्य घरेलू उत्पाद के स्तर पर पहुँच चुकी है। यह पिछले कुछ वर्षों में एक सकारात्मक वृद्धि को दर्शाता है, लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि राज्य पर कुल ऋण सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 38-39 प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में आगामी बजट के सामने दोहरी चुनौती है, एक ओर विकास की गति को बनाए रखना और दूसरी ओर वित्तीय अनुशासन को कमजोर न होने देना।

राज्य की सबसे बड़ी समस्या आज भी रोजगार की है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार राजस्थान में युवा बेरोजगारी दर 20 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है, जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसलिए बजट में रोजगार सृजन को केंद्र में रखना अनिवार्य है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग क्षेत्र इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र राज्य में लगभग 30 प्रतिशत से अधिक रोजगार उपलब्ध कराता है। बजट में स्थानीय उद्योगों, हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को सस्ती ऋण सुविधा, तकनीकी सहायता और बाजार से जोड़ने के लिए ठोस प्रावधान होने चाहिए।

पर्यटन राजस्थान की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है। राज्य में हर वर्ष लगभग 18 करोड़ से अधिक घरेलू और विदेशी पर्यटक आते हैं और पर्यटन का योगदान राज्य की आय में लगभग 12 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। यदि आगामी बजट में ग्रामीण पर्यटन, सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्यटन स्थलों और स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होम-स्टे और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए, तो इससे लाखों नए रोजगार के अवसर सृजित हो सकते हैं।

कृषि क्षेत्र राजस्थान की सामाजिक संरचना की रीढ़ है। राज्य की लगभग 65 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि कृषि का योगदान राज्य के सकल मूल्य संवर्धन में लगभग 26-27 प्रतिशत है। यह असंतुलन बताता है कि कृषि आय अपेक्षाकृत कम है। राजस्थान का लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र सूखा या अर्ध-शुष्क है, इसलिए आगामी बजट में सिंचाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों, जल संरक्षण और फसल विविधीकरण पर अधिक निवेश होना चाहिए। इससे किसान की आय स्थिर होगी और ग्रामीण मांग में वृद्धि होगी।

शिक्षा और कौशल विकास पर बजट व्यय को भविष्य के निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। राज्य में हर वर्ष लाखों युवा स्नातक बनते हैं, लेकिन रोजगारोन्मुख कौशल की कमी के कारण वे बेरोजगार रह जाते हैं। यदि बजट में व्यावसायिक शिक्षा, आईटी, पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा और कृषि-प्रसंस्करण से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त धन आवंटित किया जाए, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

राजस्थान के पास नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं। राज्य की सौर ऊर्जा क्षमता 140 गीगावॉट से अधिक आँकी जाती है, जो देश में सबसे अधिक है। बजट में सोलर पार्क, रूफ-टॉप सोलर और स्थानीय सहभागिता आधारित ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने से न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा, बल्कि दीर्घकाल में राज्य को स्थायी राजस्व भी प्राप्त होगा।

सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ बजट का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें केवल सहायता तक सीमित न रखकर आत्मनिर्भरता से जोड़ना चाहिए। राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है, ऐसे में जरूरी है कि इन योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचे और साथ-साथ रोजगार एवं कौशल से जुड़ने के अवसर भी मिलें।

अंततः, आगामी राजस्थान बजट को केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि एक संतुलित विकास-दृष्टि पत्र होना चाहिए। यदि रोजगार, कृषि, जल प्रबंधन, शिक्षा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को स्पष्ट प्राथमिकता देते हुए जनता के सुझावों को गंभीरता से शामिल किया गया, तो यह बजट न केवल आर्थिक विकास को गति देगा, बल्कि सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन को भी मजबूत करेगा। यही वह मार्ग है जो राजस्थान को आत्मनिर्भर और समावेशी विकास की ओर ले जा सकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं



