





भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान को मरुभूमि की धरती कहा जाता है, जहां रेत के असीमित धोरों और तपते सूरज के बीच जीवन कठिन प्रतीत होता है। लेकिन हनुमानगढ़ जिले के गांव बड़ोपल व आसपास के क्षेत्र ने एक अलग ही पहचान गढ़नी शुरू कर दी है। यह इलाका आजकल पर्यटन के नए केन्द्र के रूप में उभर रहा है, जहां प्रकृति, रोमांच और संस्कृति का अनूठा संगम दिखाई देता है।

मानसून की बरसात के बाद यहां पानी की आवक ने ऐसा नज़ारा बना दिया है कि सैलानी खुद को किसी टापू पर पाते हैं।
बड़ोपल से रंगमहल की ओर जाते हुए रास्ते में डिप्रेशन एरिया में पानी और रेतीले धोरों के बीच बने छोटे-छोटे टापू पर्यटकों को लुभा रहे हैं। हाल ही में पंचकुला, चंडीगढ़ और लुधियाना से आए 50 से अधिक पर्यटकों ने यहां बोटिंग और रेगिस्तान में डेज़र्ट सफारी का आनंद लिया। इन टापुओं की खासियत यह है कि ये प्रकृति की बनाई हुई अद्भुत कृतियां हैं, जहां शांति और रोमांच दोनों का अनुभव होता है।

बड़ोपल केवल प्राकृतिक सौंदर्य का केन्द्र नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक धरोहर से भी जुड़ा है। यहां आने वाले पर्यटक हनुमानगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कालीबंगा सभ्यता के इतिहास को भी जान सकते हैं। यही वजह है कि अन्य राज्यों से आने वाले सैलानी यहां रेगिस्तान की गोद में इतिहास और प्रकृति दोनों का आनंद उठा रहे हैं।
बड़ोपल को हनुमानगढ़ का नखलिस्तान कहा जाने लगा है। नखलिस्तान यानी रेगिस्तान की वह दुर्लभ जगह जहां पानी, हरियाली और जीवन की संभावनाएं एक साथ दिखाई दें। सेम से निकला हुआ लाखों लीटर पानी इस क्षेत्र में इकट्ठा होकर झील जैसी स्थिति बना देता है। यही पानी एक हरे-भरे टापू का अहसास कराता है।

स्थानीय युवाओं ने पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए बड़ोपल एडवेंचर क्लब का गठन किया है। क्लब से जुड़े लोकेन्द्र सिंह भाटी व सुनील भादू ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘बड़ोपल और रंगमहल का इलाका अपनी तरह का अनूठा स्थान है। यहां वाटर स्पोर्ट्स, कैंपिंग और सांस्कृतिक विरासत तीनों का संगम है। हमारे लिए पर्यटन केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि प्रकृति और धरोहर का संरक्षण भी है।’

खास बात है कि बड़ोपल में वाटर स्पोर्ट्स की संभावनाओं को देखते हुए जिला परिवहन विभाग ने मोटर बोटिंग के लिए लाइसेंस भी जारी किया है। यही कारण है कि अब यहां नाव की सवारी और साहसिक खेलों के लिए लोग आने लगे हैं। दिलचस्प बात है, विख्यात सूफी गायक सतिंदर सरताज और पंजाबी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री नीरू बाजवा भी यहां फिल्म की शूटिंग और बोटिंग का आनंद ले चुके हैं।

सितंबर से जनवरी का समय बड़ोपल में कैंपिंग और बर्ड वॉचिंग के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। घग्घर नदी में पानी की आवक के बाद बड़ोपल और आसपास के गांवों में जलभराव होकर यह क्षेत्र झील का रूप ले लेता है। पानी की बहुतायत होते ही यहां साइबेरिया, चीन और ऑस्ट्रेलिया से प्रवासी पक्षियों के झुंड पहुंचते हैं।

प्रकृति प्रेमी त्रिभुवन सिंह राजवी कहते हैं, ‘यहां 250 से अधिक प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते हैं, जिनमें वाटर फ्लेमिंगो, कॉमन शेल्डक, स्पूनबिल, पेलिकन, डार्टर, डेमोइसल क्रेन, ग्रेल, पिंटेल, गीज़ सहित अनेक दुर्लभ पक्षी शामिल हैं। विदेशी पक्षियों का कलरव और झील के चमकते पानी का संगम बड़ोपल को पर्यटकों के लिए स्वर्ग बना देता है।’

बड़ोपल क्षेत्र के कई हिस्सों में दृश्य इतने आकर्षक हैं कि यहां लद्दाख की पैंगोंग झील जैसे नज़ारे दिखाई देते हैं। नीले पानी की सतह पर तैरते पक्षी और चारों तरफ फैले रेतीले धोरे किसी फिल्मी लोकेशन का आभास कराते हैं। यही वजह है कि यहां आने वाले सैलानी खुद को किसी विदेशी लोकेशन पर पाते हैं।

लोकेंद्र सिंह भाटी के मुताबिक, अगर प्रशासन और पर्यटन विभाग समुचित प्रयास करें तो बड़ोपल राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान ले सकता है। यहां वाटर स्पोर्ट्स, डेज़र्ट सफारी, कैंपिंग और बर्ड वॉचिंग के लिए देश-विदेश से पर्यटक आकर्षित किए जा सकते हैं। इसके अलावा यह इलाका हनुमानगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर और कालीबंगा सभ्यता के इतिहास को भी पर्यटकों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है।

स्थानीय लोग भी मानते हैं कि पर्यटन के विकास से यहां रोजगार की नई संभावनाएं खुलेंगी। कवि नरेश मेहन कहते हैं, ‘रेगिस्तान के बीच यह नखलिस्तान क्षेत्र न केवल प्रकृति का उपहार है, बल्कि स्थानीय युवाओं की मेहनत और दूरदर्शिता का परिणाम भी है।’

सुनील भादू के मुताबिक, बड़ोपल आज केवल एक गांव नहीं, बल्कि राजस्थान में उभरता हुआ पर्यटन का केन्द्र है। जहां प्रकृति का सौंदर्य, इतिहास की गहराई, रोमांचक खेल और प्रवासी पक्षियों का कलरव एक साथ अनुभव किया जा सकता है। यह इलाका न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है, बल्कि राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर एक नई पहचान बनने की ओर अग्रसर है।



