




डॉ. एमपी शर्मा.
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। यह कहावत कभी ग्रामीण भारत की कठोर सच्चाई को दर्शाती थी, जहाँ ताकतवर ही न्याय करता था। पर दुर्भाग्य से आज यह कहावत हमारे पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे की वास्तविकता बनती जा रही है। संविधान में वर्णित ‘जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन’ का आदर्श आज खोता नजर आ रहा है।
आज हालात यह हैं कि जिसकी सत्ता है, उसके लिए कानून के मायने अलग हैं। सत्ता पक्ष के नेताओं या उनके करीबी लोगों की गलतियाँ भी नजरअंदाज़ की जाती हैं, जबकि आम आदमी को छोटी सी भूल पर भी सजा भुगतनी पड़ती है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के पक्ष में झुका हुआ दिखाई देता है, जिससे वास्तविक मुद्दे दब जाते हैं और जनता भ्रमित रहती है।
हर साल हजारों करोड़ की योजनाएँ गरीबों और जरूरतमंदों के नाम पर बनती हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, पोषण। लेकिन इन योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुँचे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ज़मीनी स्तर पर हकीकत यह है कि गरीब घंटों लाइन में खड़ा रहता है, कागज़ों की खानापूर्ति करता है, फिर भी उसका नाम सूची में नहीं आता। कई योजनाएँ फाइलों और भाषणों में ही सफल हो जाती हैं, ज़मीन पर नहीं।

लोकतंत्र का विचार समानता, न्याय और सहभागिता पर आधारित था। यह ऐसा तंत्र होना था जिसमें हर नागरिक की आवाज़ सुनी जाए, गरीब से गरीब व्यक्ति भी सम्मान के साथ अपनी बात रख सके। पर आज गरीब अगर आवाज़ उठाता है, तो या तो उसे दबा दिया जाता है या उसे ‘राजनीति से प्रेरित’ बताकर नजरअंदाज़ कर दिया जाता है।
क्या यह बदलाव स्वीकार्य है? जी नहीं। यदि हम आँख मूंदकर यह सब सहते रहे, तो ‘लोकतंत्र’ केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा और सही मायनों में ‘भीड़तंत्र’ या ‘शक्तितंत्र’ बन जाएगा। हमें यह समझना होगा कि ताकतवर की मनमानी तभी तक चलती है जब तक जनता चुप रहती है। बदलाव तभी आता है जब जनता सवाल पूछती है, जवाब मांगती है और ज़िम्मेदारी तय करती है।

समाधान क्या हो? पारदर्शिता यानी योजनाओं के खर्च और परिणामों की जानकारी आम जनता को नियमित मिले। त्वरित सुनवाई यानी गरीब, किसान, मजदूर की बात सुनी जाए और उस पर कार्रवाई हो। सशक्त मीडिया और न्यायपालिका, जो बिना दबाव के सच्चाई दिखा और फैसला सुना सके। सक्रिय नागरिकता यानी हम सबको सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सजग नागरिक बनकर कामकाज पर नजर रखनी चाहिए।
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, यह कहावत यदि आज का शासन तंत्र बन जाए तो यह लोकतंत्र नहीं, एक डरावना तमाशा बन जाएगा। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम इस तमाशे को मौन रहकर देखेंगे या अपने लोकतंत्र को उसका वास्तविक स्वरूप वापस दिलाएंगे। याद रखिए, जनता ही असली ताकत है, बस उसे अपनी ताकत पहचानने की ज़रूरत है।
-लेखक सामाजिक चिंतक, पेशे से सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



