हनुमानगढ़ में विस्फोट की योजना भले ही नाकाम हो गई लेकिन इसने एक बार फिर यह याद दिला दिया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवाद का खतरा हमेशा बना रहता है। सवाल यह है कि क्या हमारा सुरक्षा तंत्र इस चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार है?




अमरपाल सिंह वर्मा
हनुमानगढ़ के आतंकवादियों के निशाने पर होने की खबर बेहद चिंताजनक है। आज सामने आई एक खबर ने हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के पूरे इलाके को एक बार फिर आतंकवाद के पुराने काले दौर की याद दिला दी है। हरियाणा के अंबाला में पकड़े गए आतंकवादियों के एक मॉड्यूल से पूछताछ के दौरान यह खुलासा हुआ है कि उनकी साजिश की सूची में हनुमानगढ़ भी शामिल था। आतंकियों ने हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, चंडीगढ़ के कई जगह धमाके करने थे लेकिन पहला विस्फोट हनुमानगढ़ में करना था। खबर के अनुसार आतंकवादियों ने हनुमानगढ़ में आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) का एक पार्सल तक रख दिया था लेकिन विस्फोट के लिए आवश्यक आरडीएक्स समय पर नहीं पहुंच पाया, इसलिए आतंकी धमाका करने में सफल नहीं हो सके। बाद में अपने पाकिस्तानी आका के निर्देश पर वह पार्सल वापस ले गए।
यह जानकारी जितनी राहत देती है, उससे कहीं अधिक बेचैन भी करने वाली है क्योंकि इसका सीधा अर्थ है कि एक संभावित आतंकवादी हमला बहुत करीब तक आ चुका था। यह कल्पना ही भयावह है कि अगर आरडीएक्स समय पर पहुंच जाता, अगर आईईडी सक्रिय हो जाता और अगर वह किसी बाजार, बस स्टैंड या भीड़भाड़ वाली जगह पर फटता तो क्या होता?

बड़ा सवाल यह है कि आखिर आतंकवादी हनुमानगढ़ जैसे शांत जिले तक अपनी साजिशों का दायरा क्यों बढ़ाना चाहते हैं? इसका जवाब हमें इतिहास में मिलता है। आज की पीढ़ी को यह मालूम नहीं है कि तीन से चार दशक पहले हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर का इलाका कई बार आतंकवाद का दंश झेल चुका है। पंजाब में आतंकवाद के काले दौर के दौरान इस सीमावर्ती इलाके में कई दर्दनाक घटनाएं हुई थीं। संगरिया शहर में दो बार फायरिंग कर निरंकारी मिशन से जुड़े लोगों की हत्या कर दी गई, संगरिया के ढोलनगर गांव के पास बस पर फायरिंग करके एक महिला की हत्या और कई यात्रियों को घायल कर दिया गया। बाद में कार सवार दोनों आतंकवादी पुलिस मुठभेड में मारे गए। सादुलशहर में एसबीआई में दस जनों को मौत के घाट उतार दिया गया, श्रीगंगानगर में पायल सिनेमा में बम फेंका गया हनुमानगढ़ के नौरंगदेसर मेें बस में ट्रांजिस्टर बम फटा, बुढा जोड़ मेले में दो पुलिस कर्मियों की हत्या की गई और मोहनपुरा रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मियों को निशाना बना कर आतंकी दो कैदियों को छुड़ा ले गए।

उस दौर में श्रीगंगानगर जिले से लगती पाकिस्तान की सीमा से हथियार ला कर आतंकवादियों तक पहुंचाने का सिलसिला भी चलता रहा। वहां सीमा पर कई कुख्यात आतंकवादी मारे भी गएद्ध सीमा पार से भेजे गए हथियार कई बार पुलिस और बीएसएफ ने पकड़े भी लेकिन यह भी सच है कि कई बार ये हथियार अपने लक्ष्य तक पहुंच गए और उनका परिणाम निर्दाेष लोगों की जान के रूप में सामने आया।
आज हालात निश्चित रूप से पहले जैसे नहीं हैं। आतंकवाद का वह दौर बीते जमाने की बात बन चुका है और पंजाब भी सामान्य स्थिति में लौट चुका है लेकिन सीमावर्ती जिलों के लिए सुरक्षा का सवाल कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता है। देश की सीमाएं सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील रेखाएं होती हैं। सीमा पार से ड्रोन के जरिए हेरोइन और हथियारों की तस्करी की घटनाएं समय-समय पर सामने आ रही हैं। ऐसे में यह मान लेना कि खतरा पूरी तरह खत्म हो चुका है, बहुत घातक हो सकता है। हनुमानगढ़ में आईईडी रखने की साजिश के खुलासे को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भले ही यह साजिश शुरुआती स्तर पर ही विफल हो गई है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी न किसी स्तर पर आतंकियों ने इस इलाके को अपने लक्ष्य के रूप में चुना था। यह चयन यूं ही नहीं होता। इसके पीछे अक्सर इलाके की भौगोलिक स्थिति, सीमा से निकटता और स्थानीय परिस्थितियों का आकलन होता है। इसलिए यह मामला केवल एक आपराधिक खबर नहीं है बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी भी है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे सीमावर्ती जिलों में खुफिया तंत्र अब उतना सक्रिय और मजबूत है जितना होना चाहिए? क्या स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी पर्याप्त है? क्या सीमा से जुड़े इलाकों में पुलिस, खुफिया एजेंसियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बीच समन्वय पूरी तरह प्रभावी है? आतंकवाद के दौर में हनुमानगढ़ और गंगानगर के इलाके में पंजाब जितनी ही सुरक्षा व्यवस्था थी लेकिन समय के साथ उसमें भारी कमी आई है। गुप्तचर एजेंसियों की चौकियां कब की समाप्त कर दी गई हैं। इसे अब नए सिरे से देखने की जरूरत है। अब इस बात की भी पड़ताल करने की जरूरत है कि क्या आतंकवादियों को स्थानीय स्तर पर किसी प्रकार की मदद मिल रही थी या मिलने की संभावना थी? क्योंकि किसी भी आतंकवादी साजिश को जमीन पर उतारने के लिए स्थानीय संपर्कों की भूमिका अक्सर निर्णायक होती है। जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की गहराई से जांच की जाए। अगर किसी भी स्तर पर स्थानीय सहयोग या संदिग्ध गतिविधियों के संकेत मिलते हैं तो इस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। जरूरत इस बात की भी है कि पुलिस की खुफिया इकाइयों को अधिक सक्रिय और तकनीकी रूप से सक्षम बनाया जाए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों को भी जागरूक करना होगा ताकि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत प्रशासन तक पहुंचा सकें। जनता की सजगता के बिना किसी क्षेत्र की पूर्ण सुरक्षा नहीं की जा सकती।
राष्ट्रघाती तत्वों ने पूरी तैयारी की थी लेकिन हनुमानगढ़ इस बार बच गया लेकिन यह भी सच है कि कभी-कभी शहर किस्मत से बच जाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपनी सुरक्षा को किस्मत के भरोसे छोड़ सकते हैं? क्या सीमावर्ती जिलों में सुरक्षा तंत्र को और मजबूत बनाने की जरूरत नहीं है? क्या खुफिया एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय को और प्रभावी नहीं बनाया जाना चाहिए? इन सवालों पर गंभीरता से विचार करना होगा और सभी जरूरी कदम उठाने होंगे। ऐसा करके ही हम राष्ट्रघाती तत्वों को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। यह मामला सुरक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है और इसी के अनुरूप खतरे को समझ कर तैयारी करनी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




