



भटनेर पोस्ट डॉट कॉम.
जब कोई कलाकार अपने भीतर की आवाज़ को पहचान लेता है और उसे जनसेवा में रूपांतरित कर देता है, तब वह एक व्यक्ति से कहीं ऊपर उठकर एक विचार, एक आंदोलन, एक विद्यालय बन जाता है। गुलशन अरोड़ा ऐसे ही एक व्यक्तित्व का नाम है। संगीत के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण ने उन्हें गुरु बृजमोहन शर्मा की शरण में पहुंचाया, जहां से उन्होंने सुरों की साधना आरंभ की। यह साधना उन्हें श्रीगंगानगर ले गई, जहां परीक्षा केंद्र पर बीकानेर के डॉ. मुरारी शर्मा से हुई भेंट ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। डॉ. शर्मा के सुझाव पर उन्होंने तय किया कि हनुमानगढ़ जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध ज़िले में भी एक ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां संगीत न केवल सीखा जाए, बल्कि उसमें परीक्षा भी दी जा सके। मित्र मंडली से विचार-विमर्श के उपरांत जब पंकज शर्मा ने संस्था के लिए ‘हंसवाहिनी’ नाम सुझाया, तो यह नाम केवल एक संस्था का नाम नहीं रहा, यह सुरों की एक उड़ान बन गया, जो आज तक अनवरत जारी है।
गुलशन अरोड़ा आज सिर्फ एक संगीत शिक्षक नहीं हैं, वे उन स्वरों की जीवंत मिसाल हैं जो आत्मा को छूते हैं और समाज में संस्कृति के बीज बोते हैं। संस्था की नींव रखना आसान नहीं था। सबसे पहली चुनौती थी स्थान की। जब कोई स्थान नहीं मिला तो घर के एक कमरे को ही संगीत की पाठशाला बना लिया। वाद्ययंत्रों की कमी थी, लेकिन मित्रों ने सहयोग किया और धीरे-धीरे सुरों की यात्रा शुरू हुई। एक संगीत शिक्षक के रूप में उनका अनुभव किताबों से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों से मिला। उन्होंने विद्यार्थियों की भावना को समझा, और हर विद्यार्थी को सिखाते समय इसे एक ‘उपासना’ माना। यही समर्पण संस्था की आत्मा बन गया।

मिला अपनों का साथ
जब उनसे पूछा कि क्या कभी ऐसा समय आया जब उन्होंने खुद को अकेला महसूस किया, तो उनका जवाब था, ‘नहीं।’ ईश्वर, परिवार और मित्रों का सहयोग हर वक्त उनके साथ रहा। उनके दिन की शुरुआत सुरों के साथ होती है और शाम तबले की थाप में ढलती है। गुलशन अरोड़ा का मानना है कि जब हौसले बुलंद हों, और साथ में सच्चा स्नेह हो, तो कोई भी सपना साकार किया जा सकता है। उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस यात्रा को कभी छोड़ देने का विचार तक उनके मन में नहीं आया। हर क्षण संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने की ही कामना की।
दिल के सबसे करीब उपलब्धियां
संस्था की कई उपलब्धियां हैं, लेकिन कुछ खास हैं, हनुमानगढ़ को संगीत परीक्षा केंद्र दिलाना, विद्यार्थियों का राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन, और एक वातानुकूलित संगीत विद्यालय का निर्माण।

मंचों से सम्मान की प्राप्ति
संस्था और उनके स्वयं को कई प्रतिष्ठित मंचों से सम्मान प्राप्त हुआ, जिनमें शामिल हैं, पं. रघुनाथ तेलंगॉवकर फाउंडेशन ट्रस्ट, आगरा, श्री संगीत भारती, बीकानेर, राष्ट्रीय कला मंदिर, गंगानगर, जिला प्रशासन, हनुमानगढ़, भारत स्काउट गाइड, बीकानेर, अग्रवाल समाज समिति, हनुमानगढ़, भारत विकास परिषद (गुरु वंदन छात्र अभिनंदन), संगीत कला संस्थान, सूरतगढ़, गुरुद्वारा भक्त बाबा नामदेव जी, हनुमानगढ़, लायंस क्लब, हनुमानगढ़, सिख वर्ल्ड म्यूजिक, श्रीगंगानगर।
युवाओं में संगीत के प्रति लगाव कैसे बढ़ाया?
गुलशन अरोड़ा ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘संस्था युवाओं में संगीत के प्रति रुचि जगाने के लिए पारंपरिक और आधुनिक दोनों पद्धतियों का सहारा लेती है। शास्त्रीय, फिल्मी, लोक संगीत की शिक्षा देने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक जैसे संगीत ऐप्स, यूट्यूब चौनल्स आदि का भी उपयोग किया जाता है। साथ ही विभिन्न त्योहारों, अवसरों पर गीतों की जानकारी और प्रतियोगिताओं के माध्यम से मंच प्रदान किया जाता है।’

कौन-कौन सी विधाएं सिखाई जाती हैं?
संस्था में शास्त्रीय गायन, लोकगीत, भजन, गुरबाणी शब्द जैसे गायन विधाओं के साथ-साथ हारमोनियम, सिंथेसाइज़र, तबला, ढोलक, गिटार, युकुलेले, केहोन, कोंगो, ड्रम सेट, ऑक्टोपैड आदि वाद्ययंत्रों का प्रशिक्षण दिया जाता है। संस्था में संगीत को केवल एक कला नहीं, एक साधना माना जाता है। निरंतर अभ्यास, समर्पण और अनुशासन के साथ सांस्कृतिक मूल्य, नैतिकता और समाज के प्रति समझ विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
नवाचार की मिसाल
जब साधन कम थे, तब भी सीखने-सिखाने का क्रम नहीं रुका। हारमोनियम और ढोलक की कमी को लकड़ी की तख्तियों और हाथ की गिनती से पूरा किया गया, यह नवाचार आज भी कई स्कूलों में अपनाया जा रहा है।

अब तक 8000 से अधिक विद्यार्थियों को दी शिक्षा
संस्था में अब तक 8000 से अधिक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी जा चुकी है, यह आंकड़ा अपने आप में संस्था की व्यापकता और समर्पण को दर्शाता है। संस्था के प्रत्येक सदस्य ने इसे परिवार की तरह सींचा है। माता-पिता, भाई, पत्नी, बच्चों के साथ-साथ गुरुजनों और स्कूल प्रशासन। सभी ने इस यात्रा में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से एसआरएम इंटरनेशनल स्कूल, जहां वे 2003 से कार्यरत हैं, उनका विशेष योगदान रहा है। संस्थापक गुलशन अरोड़ा मानते हैं कि जब तक शिक्षा प्रणाली में संगीत नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इसकी विरासत खतरे में रहेगी। 1992 से पूर्व स्कूलों में संगीत पढ़ाया जाता था, अब नई शिक्षा नीति में इसे फिर से लाने की आवश्यकता है।
भविष्य की योजनाएं
संस्था अब ऑनलाइन संगीत शिक्षा की ओर बढ़ रही है। भविष्य में एक बड़े परिसर की योजना है, जहां हर संगीत विषय के लिए अलग-अलग कक्ष होंगे और विशेषज्ञ शिक्षक होंगे। गुलशन अरोड़ा ने सीखा कि निरंतर अभ्यास, लगन और जुनून से किया गया कोई भी कार्य अंततः सफलता की ओर ले जाता है।

नवोदित कलाकारों और शिक्षकों के लिए संदेश
गुलशन अरोड़ा के मुताबिक, संगीत को गहराई से जानें, हर दिन कुछ नया सीखें, छात्रों में संगीत के प्रति उत्साह पैदा करें, और तकनीक का सदुपयोग करें। आनंददायक कक्षा वातावरण और रचनात्मक समुदाय का हिस्सा बनें।
सरकार, समाज और संगठनों से अपेक्षाएं
संगीत के शिक्षक व प्रशिक्षक गुलशन अरोड़ा ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘सरकार स्कूलों में संगीत को अनिवार्य करे, संगीत संस्थानों को सहायता दे। समाज संगीत कार्यक्रमों में रुचि लेकर इसे बढ़ावा दे। निजी संस्थाएं कलाकारों को मंच और आर्थिक सहयोग देकर उनकी राह आसान करें।’ लिहाजा, कहा जा सकता है कि हंसवाहिनी संगीत कला मंदिर केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है, जो यह बताता है कि सीमित संसाधन भी स्वरों के माध्यम से असीम ऊंचाई प्राप्त कर सकते हैं। यह मंदिर है उन सुरों का, जो आत्मा को स्पर्श करते हैं।
