



भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
झालावाड़ और भीलवाड़ा सहित कुछ जिलों में हुए स्कूल हादसे ने पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को झकझोर दिया है। सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हादसे से सबक लेते हुए शिक्षा विभाग ने प्रदेश के करीब 63 हज़ार स्कूलों का सर्वे कराया। सर्वे रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में स्कूल भवन और शौचालय जर्जर हालत में पाए गए हैं।

सर्वे के अनुसार, प्रदेश के 5567 स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं, जबकि 1579 भवन जर्जर घोषित किए जा चुके हैं। भवनों की मरम्मत पर लगभग 8000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। शौचालयों की हालत भी बेहतर नहीं है। प्रदेश के 1.71 लाख से ज्यादा शौचालयों में से 17,1009 पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं। इसका सीधा असर बच्चों की सुरक्षा और स्वच्छता पर पड़ रहा है।

शिक्षा विभाग ने अनुमान लगाया है कि सभी स्कूलों की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए करीब 25 हज़ार करोड़ रुपए चाहिए। लेकिन फिलहाल विभाग के पास इतनी बड़ी राशि का कोई स्रोत नहीं है। केंद्र और राज्य सरकार से नया भवन बनाने के लिए तो समग्र शिक्षा अभियान के तहत सालाना 500 करोड़ रुपए का बजट मिलता है, लेकिन पुराने भवनों की मरम्मत के लिए कोई तय मद उपलब्ध नहीं है।

बीते 10 सालों में राज्य सरकार ने मरम्मत के लिए बजट घोषणाओं में सिर्फ 400 करोड़ रुपए स्वीकृत किए, वह भी किस्तों में। यदि यही गति रही तो स्कूलों को सुरक्षित बनाने के लिए 60 साल का इंतजार करना पड़ सकता है। सवाल उठता है कि तब तक बच्चों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?

फैक्ट फाइल
कुल स्कूल: 63,000
संपूर्ण जर्जर भवन: 5567
जर्जर घोषित भवन: 1579
सुरक्षित शौचालय: 36,154
पूरी तरह जर्जर शौचालय: 1.71 लाख में से 17,1009

कितनी लागत?
प्राइमरी स्कूल भवन: 73 लाख रुपए
प्राथमिक स्कूल भवन: 1 करोड़ रुपए
माध्यमिक स्कूल भवन: 5 करोड़ रुपए
कुल अनुमानित खर्च: 25,000 करोड़ रुपए

केंद्र से क्या मिलता है?
नया भवन निर्माण: 500 करोड़ रुपए (वार्षिक)
मरम्मत बजट: न के बराबर
पिछले 10 साल में मरम्मत हेतु: 400 करोड़ रुपए (किस्तों में)
बड़ा सवाल
-क्या सरकार बच्चों की सुरक्षा को अगले 60 साल तक टाल सकती है?
-क्या शिक्षा ढांचे के लिए विशेष पैकेज नहीं बनना चाहिए?
-क्या हादसे का इंतजार कर ही स्कूलों की मरम्मत होगी?



