





भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान की सड़कों पर रफ्तार का रोमांच अब डर में बदलता जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में राज्य में सड़क हादसे और नशे में गाड़ी चलाने के मामलों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है, उसने प्रशासन की नींद हराम कर देनी चाहिए थी, पर अफसोस, ऐसा हुआ नहीं। आंकड़े साफ बताते हैं कि समस्या अब केवल सड़क अनुशासन की नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और सरकारी लापरवाही की भी है।

2024 में पूरे साल के दौरान 40,715 चालकों को शराब के नशे में वाहन चलाते पकड़ा गया था। लेकिन 2025 के सितंबर तक ही यह संख्या 43,788 पर पहुंच चुकी है। यानी अभी तीन महीने बाकी हैं और आंकड़ा पहले ही 8 प्रतिशत बढ़ चुका है। दरअसल, आंकड़ों का यह आतंकी खेल उन हज़ारों परिवारों की त्रासदी का संकेत है, जिनकी खुशियां किसी नशेड़ी ड्राइवर के पहियों तले कुचली जाती हैं।

हर बार जब सड़कों पर शराबी ड्राइवर पकड़ा जाता है, तो सवाल उठता है, क्या सिर्फ चालान काट देने से अपराध रुक जाता है? जवाब साफ है, नहीं। जागरूकता अभियानों की कमी, पुलिस की सुस्ती और सज़ा की गंभीरता का अभाव इस समस्या को और गहराता जा रहा है। कई जगहों पर तो ‘ड्रंक एंड ड्राइव’ की जांच महज़ दिखावा बनकर रह गई है। ‘ब्रेथ एनलेजर’ मशीनें धूल खा रही हैं, और चेकिंग पॉइंट्स रात के बजाय दिन में लगाए जाते हैं, जब लोग वैसे भी होश में होते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2023 रिपोर्ट तो और भी भयावह तस्वीर पेश करती है। सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में राजस्थान देशभर में सातवें स्थान पर है। कुल 24,694 हादसों में 4,172 लोगों की जान चली गई, यह आंकड़ा किसी युद्ध क्षेत्र का नहीं, बल्कि हमारे अपने राज्य का है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर अकेले 7,179 हादसे हुए, और मौतों के मामले में राजस्थान देश में पांचवें नंबर पर है। ये संख्याएं किसी प्रशासनिक फाइल में दर्ज ठंडी सूचनाएं नहीं हैं, बल्कि हर उस घर की चीख हैं जिसने किसी अपने को सड़कों पर खोया है।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने 13 मार्च को संसद में रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें राजस्थान के 954 ब्लैक स्पॉट्स का उल्लेख है। ये वे जगहें हैं जहां दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। दुखद यह है कि इनमें से सिर्फ 238 स्थानों पर ही सुधार का काम पूरा हुआ। बाकी 700 से अधिक जगहों पर या तो फाइलें घूम रही हैं या ठेकेदारों की मशीनें। यह न सिर्फ उदासीनता है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति अपराध भी है।

राज्य के परिवहन विभाग ने सामान्य सड़कों पर भी 118 ऐसे संवेदनशील बिंदु चिन्हित किए हैं। सवाल यह है कि जब पहचान हो चुकी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं? क्या सरकार हादसों के आंकड़े बढ़ने का इंतजार कर रही है ताकि अगली रिपोर्ट में और ष्डरावनेष् नंबर लिखे जा सकें?

हर हादसे के बाद संवेदना जताई जाती है, मुआवजे की घोषणा होती है और फिर सब शांत। यही प्रशासनिक संस्कृति सबसे खतरनाक है। सड़क सुरक्षा सिर्फ कानून या यातायात पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, यह एक साझा दायित्व है। शराब बेचने वाले से लेकर वाहन निर्माता और सड़क इंजीनियर तक, सबकी भूमिका तय होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह कि हमारे यहां जिम्मेदारी का बँटवारा तो खूब होता है, पर जवाबदेही कोई नहीं लेता।

सामाजिक कार्यकर्ता मोहित बलाडिया कहते हैं, ‘अगर सरकार सच में हादसों को रोकना चाहती है, तो उसे कागजी रिपोर्टों से बाहर आना होगा। सड़क सुरक्षा अभियानों को केवल ‘सप्ताह’ भर की औपचारिकता न बनाकर स्थायी अभियान में बदलना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में ट्रैफिक एजुकेशन को अनिवार्य करना चाहिए ताकि अगली पीढ़ी सड़कों को खेल का मैदान न समझे। पुलिस को आधुनिक बॉडी कैमरा और ड्रोन निगरानी जैसे उपकरणों से लैस करना होगा।’

सामाजिक कार्यकर्ता आदित्य गुप्ता कहते हैं, ‘न्याय व्यवस्था को भी तेज़ी दिखानी होगी। नशे में वाहन चलाने वालों के लिए न्यूनतम दंड सख्त और तत्काल होना चाहिए, क्योंकि ‘देरी’ न्याय की हत्या है। साथ ही, ब्लैक स्पॉट्स के सुधार कार्य को मिशन मोड में लाया जाना चाहिए, नहीं तो ये स्थान ‘मौत के स्थायी पते’ बने रहेंगे।’
राजस्थान की सड़कों पर हर मोड़, हर किलोमीटर एक कहानी कहता है, कहीं किसी का बेटा नहीं लौटा, कहीं किसी की उम्मीदें बिखर गईं। आंकड़ों का बढ़ना सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता के क्षय का संकेत है। जब तक समाज नशे को ‘मज़े’ और लापरवाही को ‘आदत’ मानना बंद नहीं करेगा, तब तक सड़कें सजा देती रहेंगी। सवाल यही है, क्या हम अगला हादसा होने का इंतजार करेंगे, या अब चेतेंगे?



