





डॉ. संतोष राजपुरोहित.
दक्षिण एशिया, जनसंख्या, सांस्कृतिक विविधता, और आर्थिक क्षमता के लिहाज से विश्व का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र की सामूहिक उन्नति और सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 8 दिसंबर 1985 को दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना की गई। इसके संस्थापक सदस्य भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और मालदीव थे; बाद में अफगानिस्तान भी जुड़ गया। सार्क का मूल उद्देश्य क्षेत्रीय एकता, आर्थिक विकास, सांस्कृतिक और सामाजिक सहयोग को प्रोत्साहित करना था, ताकि यह क्षेत्र गरीबी, अशिक्षा, और अविकास के दुष्चक्र से बाहर निकल सके।

परंतु स्थापना के चार दशक बाद भी सार्क अपने उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सका। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख राजनीतिक अविश्वास और भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंध। संगठन के निर्णयों का सर्वसम्मति के आधार पर होना इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई है। किसी एक देश की असहमति पूरे निर्णय को रोक सकती है, जिससे सहयोग की गति बार-बार ठहर जाती है।

वर्तमान समय में सार्क लगभग निष्क्रिय स्थिति में है। 2016 में होने वाला सार्क शिखर सम्मेलन पाकिस्तान में आयोजित होना था, परंतु उरी आतंकी हमले के बाद भारत सहित कई देशों ने उसका बहिष्कार कर दिया। तब से अब तक कोई पूर्ण शिखर सम्मेलन नहीं हुआ। इस निष्क्रियता का परिणाम यह है कि दक्षिण एशिया का क्षेत्र, जो विश्व की 25 फीसदी से अधिक जनसंख्या रखता है, अभी भी क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण और नीति समन्वय में पिछड़ा हुआ है।

भारत के पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती सक्रियता ने भी सार्क की उपयोगिता को प्रश्नों के घेरे में डाल दिया है। चीन ‘ऑब्जर्वर स्टेट’ के रूप में जुड़ा हुआ है, किंतु उसका प्रभाव बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान में तीव्रता से बढ़ रहा है। इससे भारत की पारंपरिक नेतृत्व भूमिका को चुनौती मिल रही है।

भारत, जो सार्क क्षेत्र का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से सबसे शक्तिशाली देश है, इस संगठन के केंद्र में रहा है। भारत की विदेश नीति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘पड़ोसी प्रथम’ के सिद्धांतों पर आधारित रही है। भारत ने व्यापार, ऊर्जा, शिक्षा, और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सार्क सहयोग को प्रोत्साहित किया। भारत की पहल पर ही सार्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई विकास निधि और आपदा प्रबंधन केंद्र की स्थापना हुई।

किन्तु भारत भी यह महसूस करता है कि सार्क का ढांचा अपनी सीमाओं के कारण अब उतना प्रभावी नहीं रहा। इसलिए भारत ने ‘बिम्सटेक’ जैसे वैकल्पिक मंचों पर अधिक ध्यान देना प्रारंभ किया है। बिम्सटेक, जो दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को जोड़ता है, भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के साथ बेहतर सामंजस्य रखता है।

यद्यपि सार्क वर्तमान में निष्क्रिय है, फिर भी इसकी प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। दक्षिण एशिया में गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, और सीमा-पार अपराध जैसी समान चुनौतियाँ हैं, जिनसे निपटने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। यदि भारत और पाकिस्तान राजनीतिक मतभेदों को कुछ समय के लिए किनारे रखकर क्षेत्रीय हित को प्राथमिकता दें, तो सार्क पुनर्जीवित हो सकता है।

भविष्य में सार्क के पुनरुद्धार के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं। जैसे, निर्णय प्रक्रिया में लचीलापन लाया जाए ताकि सर्वसम्मति के बजाय बहुमत से भी निर्णय लिए जा सकें। व्यापार और परिवहन के क्षेत्र में एकीकरण बढ़ाया जाए, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को ठोस आधार मिल सके। डिजिटल और हरित सहयोग, जैसे नए क्षेत्रों को जोड़ा जाए, जिससे युवा पीढ़ी को अवसर मिले। भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को सकारात्मक और समावेशी बनाते हुए छोटे देशों का विश्वास बढ़ाया जाए।
दक्षिण एशिया की स्थिरता और विकास केवल राष्ट्रीय हितों से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय एकता से संभव है। सार्क एक ऐसा मंच है जो इस दिशा में पुल का कार्य कर सकता है। भारत यदि अपने पड़ोसी देशों के साथ सह-अस्तित्व और पारस्परिक लाभ के सिद्धांत पर आगे बढ़े, तो यह संगठन पुनः जीवंत हो सकता है। बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और क्षेत्रीय नेतृत्व ही सार्क के भविष्य को नई दिशा दे सकती है। इस प्रकार, सार्क का भविष्य भारत की दृष्टि और दक्षिण एशियाई देशों की एकजुटता पर निर्भर करता है कृ जहाँ सहयोग ही स्थायी शांति और विकास की कुंजी बने।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं



