






गोपेश्वर.
भारत में चुनावों के मौसम में नेता जनता से रोज़-रोज़ वादे करते हैं। कभी मुफ्त बिजली, कभी मुफ्त राशन, कभी मुफ्त डेटा। लेकिन एक चीज़ है जो कभी मुफ्त नहीं मिलती, प्रधानमंत्री की डिग्री की झलक। दिल्ली हाईकोर्ट ने अब साफ़ कर दिया है कि जनता की यह जिज्ञासा केवल “जिज्ञासा” ही रह जाएगी।

दरअसल, कहानी 2016 से शुरू होती है। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूछा, ‘जनाब, 1978 में किसने बीए पास किया, ज़रा नाम-गाम बता दो।” यह वह साल है जब देश के वर्तमान प्रधानमंत्री ने कथित रूप से परीक्षा पास की थी। सूचना आयोग ने भी कहा, ‘अरे भाई, इसमें छुपाने जैसा क्या है? विश्वविद्यालय तो अक्सर पास-फेल लिस्ट नोटिस बोर्ड पर टांगता है, अखबारों में छपवाता है। अब तो वेबसाइट भी है।’

लेकिन विश्वविद्यालय ने जैसे ही यह सुना, उसके माथे पर बल पड़ गए। जवाब आया, ‘नहीं-नहीं, यह तो व्यक्तिगत जानकारी है। इसे हम गोपनीय तिजोरी में रखते हैं। यह ‘फिड्युशियरी कैपेसिटी’ है। भरोसे की बात है।’

भरोसा! देश का प्रधानमंत्री अरबों जनता से भरोसा चाहता है, मगर जनता उसकी डिग्री पर भरोसा न करे, यह कैसी विडंबना!
हाईकोर्ट ने सोमवार यानी 25 अगस्त को फैसला सुनाते हुए आयोग का आदेश पलट दिया। मतलब साफ है, प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक नहीं होगी। जनता अब चाहे जितना ‘डिग्री-डिग्री’ करे, विश्वविद्यालय को कोई मजबूरी नहीं।

राजनीति में डिग्री अब नई राजनीतिक करेंसी बन चुकी है। एक ओर विपक्ष डिग्री दिखाने का आंदोलन चलाता है, मानो बिना मार्कशीट देखे वोट डालना अक्षम्य अपराध हो। वहीं, सत्तापक्ष कहता है, ‘भाई, डिग्री से क्या होगा? देख लो विकास, देख लो भाषण कला, देख लो विदेश यात्राएँ।’

कहते हैं, लोकतंत्र में पारदर्शिता जरूरी है। पर शायद कुछ पारदर्शिताएँ इतनी चकाचौंध कर देती हैं कि देखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जनता पूछती है, ‘प्रधानमंत्री जी, आपका स्नातक किस विषय में है?’ जवाब आता है, ‘देश सेवा में।’ विषय भी ऐसा कि कोई यूनिवर्सिटी कोर्स में डाल ही न पाए।

आज हालत यह है कि बेरोज़गार युवक नौकरी के लिए अपनी पूरी शिक्षा का रिकॉर्ड साक्षात्कार बोर्ड पर रख देता है, हाई स्कूल से लेकर मास्टर्स तक। वहीं देश का सर्वाेच्च पद संभालने वाला कहता है, ‘डिग्री व्यक्तिगत है, सार्वजनिक नहीं।’
मजेदार बात तो यह है कि चुनावी रैलियों में नेताओं के वादे नोटिस बोर्ड पर छपते हैं, भाषण लाइव स्ट्रीम होते हैं, लेकिन डिग्री, वह लोकतंत्र की तिजोरी में बंद रहती है।

इस पूरे प्रकरण में लब्बोलुआब यह है कि अदालत ने डिग्री को छुपाने का आदेश दे दिया, मगर जनता की जिज्ञासा को और बढ़ा दिया। अब तो लोग सोचने लगे हैं, ‘भाई, इस डिग्री में ऐसा क्या राज़ है जो इसे देखने के लिए एक्स-रे मशीन चाहिए?’
राजनीति का यही सौंदर्य है। यहाँ डिग्री नहीं, डिग्री की चर्चा ही सबसे बड़ी डिग्री है। विपक्ष सवाल पूछेगा, सरकार जवाब टालेगी, और जनता। जनता बस अगले चुनाव में फिर वही सवाल पूछेगी।
इसलिए, आइए मान लें, डिग्री न सही, देश की डेमोक्रेसी में पास होना ही असली उपलब्धि है। और हमारी राजनीति तो यही साबित करती है कि यहाँ फेल कोई होता ही नहीं। सब पास, सब महान, सब ‘योग्य’, डिग्री चाहे रहे तिजोरी में या फिर कल्पना लोक में।


