


भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
देश एक ओर आज़ादी के 78वें पर्व, 15 अगस्त का जश्न मनाने की तैयारियों में डूबा है, वहीं राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय की सड़कों पर 13 अगस्त को एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला। भारत माता चौक से लेकर सेंट्रल पार्क के सामने स्थित बिजली विभाग के कार्यालय तक गूंज रहा था ‘ये है जनता की ललकार, बंद करो ये भ्रष्टाचार।’ हाथों में चप्पलें लिए सैकड़ों लोग मार्च कर रहे थे। देखने वालों को यह किसी फिल्म का दृश्य लगा, लेकिन यह कोई शूटिंग नहीं थी, यह थी हकीकत, गुस्से और असंतोष से भरी जनता की तस्वीर। भारत माता चौक से शुरू हुआ यह ‘चप्पल मार्च’ बिजली विभाग की कार्यप्रणाली के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध था। भीड़ में बुजुर्ग, युवा व महिलाएं भी नजर आईं। लोग लाउडस्पीकर पर बजते गीतों के साथ नारे लगा रहे थे। मार्च सेंट्रल पार्क के सामने बिजली दफ्तर पहुंचकर रुका। वहां एक-एक कर लोगों ने हाथों की चप्पलें दफ्तर के सामने फेंकीं, मानो संदेश दे रहे हों, अगर हालात नहीं सुधरे तो अगली बार यही चप्पलें अफसरों के सिर पर होंगी। इस मौके पर हुई सभा का संचालन विधायक गणेशराज बंसल के राजनीतिक सलाहकार अमित महेश्वरी ने किया। मंच पर विधायक बंसल के साथ पूर्व सभापति सुमित रणवां, मुकेश भार्गव और कई स्थानीय नेता मौजूद थे।

विधायक गणेशराज बंसल ने भाषण में साफ कहा, ‘बिजली विभाग की कार्यप्रणाली से हर कोई त्रस्त है। लाइनमैन से लेकर एसई तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जनता का फोन तक उठाना अफसर जरूरी नहीं समझते, और जब जवाब देते हैं तो संतोषजनक नहीं होता। 2018 तक के आवेदकों को कृषि कनेक्शन नहीं दिया जा रहा है। आज तो हमने ऑफिस के सामने चप्पलें फेंकी हैं, लेकिन अगर हालात नहीं सुधरे तो ये चप्पलें भ्रष्ट अधिकारियों के सिर पर फेंकी जाएंगी।’

विधायक बंसल ने बिजली विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ दिन पहले बिजलीकर्मियों ने जानबूझकर आम जनता को सुविधा से वंचित किया। जीएसएस को खाली छोड़कर कर्मचारी धरना-प्रदर्शन पर चले गए, जिससे शहर और गांवों में बिजली ठप रही। गर्मी में लोग बेहाल हुए। यह किसी अप्रत्याशित घटना या हादसे को जन्म दे सकता था। यह चप्पल मार्च सिर्फ सांकेतिक प्रदर्शन है। अगर सुधार नहीं हुआ, तो जनता और सख्त कदम उठाने को मजबूर होगी।

पत्रकारों ने विधायक से पूछा-‘चप्पल मार्च का सीधा संदेश क्या है?’ इस पर गणेशराज बंसल का सीधा उत्तर था, ‘संदेश यह है कि अफसर सुधर जाएं। अगर जनता पैरों की चप्पलें हाथ में उठाने लगे तो समझिए सब्र की सीमा टूट चुकी है। और यह भी हो सकता है कि अगली बार इन्हें अफसरों के सिर पर फेंकना पड़े।’

एक दिन पहले जन संवाद कार्यक्रम में बीजेपी के कई नेता मौजूद थे, लेकिन पार्टी के जिलाध्यक्ष प्रमोद डेलू ने इसे बीजेपी का आधिकारिक कार्यक्रम मानने से इंकार कर दिया था। इस पर विधायक बंसल ने तीखी प्रतिक्रिया दी, ‘भारतीय जनता पार्टी किसी एक जिलाध्यक्ष की बपौती नहीं है। अगर प्रमोद डेलू नहीं जाएंगे, तो क्या कार्यक्रम बीजेपी का नहीं होगा? देवेंद्र पारीक पूर्व जिलाध्यक्ष हैं, कर्मठ कार्यकर्ता हैं, दो बार पार्षद रह चुके हैं। उनकी अगुवाई में महापंचायत हो रही है तो यह बीजेपी की ही है। अकेले जिलाध्यक्ष के कह देने से कार्यक्रम का स्वरूप तय नहीं होता।’

भीड़ में मौजूद लोगों का कहना था कि भ्रष्टाचार और लापरवाही ने बिजली सेवा को पंगु बना दिया है। महीनों से लंबित कनेक्शन, बार-बार फ्यूज उड़ना, और शिकायतों पर कार्रवाई न होना, ये सब आम हो गया है। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि अफसर और कर्मचारी, दोनों जनता की परेशानी को हल्के में ले रहे हैं।

विधायक बंसल ने यह भी कहा कि राज्य सरकार आम जनता को बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं देने के लिए कटिबद्ध है। उन्होंने आश्वासन दिया, ‘एक सितंबर से विधानसभा सत्र शुरू हो रहा है। मैं आम जनता से जुड़े मसलों को जोर-शोर से उठाऊंगा।’ लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी, अगर बिजली विभाग ने अपना रवैया नहीं बदला, तो सड़कों पर उतरने वाली भीड़ और उग्र हो सकती है।

विधायक के राजनीतिक सलाहकार अमित महेश्वरी भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘चप्पल मार्च’ कोई हिंसक आंदोलन नहीं था, लेकिन इसका प्रतीकात्मक असर गहरा है। चप्पल, जो रोजमर्रा में पैरों के नीचे रहती है, उसे हाथ में उठाकर अफसरों के खिलाफ लहराना एक तीखा राजनीतिक और सामाजिक संदेश है। यह सीधी चुनौती है उस तंत्र को, जो जनता की सेवा करने की बजाय अपने पद को ‘सुविधा शुल्क’ कमाने का साधन बना चुका है।’
स्वतंत्रता दिवस के ठीक पहले जनता का यह प्रदर्शन इस सवाल को भी खड़ा करता है कि आज़ादी का असली मायना क्या है, सिर्फ झंडा फहराना और राष्ट्रगान गाना, या जनता को भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से भी आज़ाद कराना? हनुमानगढ़ की सड़कों पर गूंजते नारे शायद इसी सवाल का जवाब मांग रहे थे।

