




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में मूल ओबीसी वर्ग का संघर्ष एक बार फिर तेज होने जा रहा है। नेशनल जनमंडल पार्टी, मूल ओबीसी संगठन और सामाजिक समरसता न्याय मंच ने राज्य सरकार और भाजपा पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए आंदोलन का बिगुल बजाने की घोषणा कर दी है। इसी क्रम में 19 अक्टूबर को प्रदेशभर में ‘काला दिवस’ मनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। संगठन का आरोप है कि भाजपा ने चुनावी लाभ के लिए वादे तो किए लेकिन सत्ता में आने के बाद अदालत के आदेश तक की अनदेखी कर दी।

मूल ओबीसी संगठन से जुड़े सुरेंद्र मारवाल ने ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से बातचीत में खुलासा किया कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने नेशनल जनमंडल पार्टी प्रत्याशी दौलतराम पैंसिया को चूरू सीट से हटने का आग्रह किया था। इसके एवज में संगठन ने राज्य सरकार से मांग रखी थी कि राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर की ओर से 10 अगस्त 2015 को दिए गए आदेश की पालना की जाए और पिछड़ा वर्ग की सूची का पुनरीक्षण किया जाए।

इस संदर्भ में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ वार्ता भी करवाई थी। उस समय मुख्यमंत्री ने चुनाव के बाद नियमानुसार राहत दिलाने का वादा किया। लेकिन संगठन का आरोप है कि चुनाव हुए डेढ़ साल से अधिक समय बीत चुका है और अब तक सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यही कारण है कि मूल ओबीसी वर्ग में गहरा असंतोष व्याप्त है और संगठन भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहा है।

सामाजिक समरसता न्याय मंच के प्रदेशाध्यक्ष रामप्रताप भाट ने स्पष्ट कहा कि 10 अगस्त 2015 को राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि ओबीसी सूची में शामिल जातियों का दस वर्ष बाद पुनरीक्षण किया जाए। यह तय किया गया था कि प्रत्येक जाति को सूची में शामिल किए जाने के दस साल पूर्ण होने पर समीक्षा अनिवार्य होगी। लेकिन सरकारों ने इस आदेश की गंभीरता से पालना की।

रामप्रताप भाट के अनुसार, ‘भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान मूल ओबीसी समाज से समर्थन प्राप्त करने के लिए पुनरीक्षण का वादा किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद वादा झूठा साबित हुआ। जब अदालत तक के आदेश को दरकिनार किया जा रहा है, तब हमारे पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।’

मूल ओबीसी संगठन के नेता सुरेंद्र मारवाल के मुताबिक, न्यायालय ने साफ कहा था कि ओबीसी आरक्षण की परिधि से सक्षम जातियों को बाहर किया जाए और आरक्षण का वर्गीकरण किया जाए। इससे वास्तविक रूप से पिछड़े समाज को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिल सकेगा। लेकिन आज तक यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई।

सुरेंद्र मारवाल का कहना है कि यदि सक्षम व प्रभावशाली जातियां ओबीसी सूची में बनी रहती हैं, तो मूल ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण महज कागजी साबित होगा। यही कारण है कि संगठन इस मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। काबिलेगौर है, मूल ओबीसी आंदोलन की पृष्ठभूमि भी कम विवादित नहीं है। 19 अक्टूबर 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जाट जाति को ओबीसी में शामिल करने का निर्णय लिया था। इसी निर्णय के बाद से राजस्थान में ‘ओबीसी बनाम मूल ओबीसी’ का संघर्ष शुरू हुआ।

मूल ओबीसी वर्ग से जुड़ी जातियों का आरोप है कि जाट जाति ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली और संगठित रही है। ऐसे में भाजपा ने केवल चुनावी लाभ के लिए उसे ओबीसी श्रेणी में शामिल किया, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ गया। संगठन का कहना है कि इसके बाद प्रभावशाली जाति के लोग शिक्षा, नौकरियों और राजनीति हर जगह हावी हो गए, जबकि वास्तविक पिछड़ी जातियां उपेक्षित रह गईं।
अब मूल ओबीसी संगठनों ने तय किया है कि 19 अक्टूबर को पूरे प्रदेश में ‘काला दिवस’ मनाया जाएगा। यह तिथि भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि इसी दिन 1999 में जाट जाति को ओबीसी में शामिल करने की घोषणा की गई थी। संगठनों का कहना है कि यह फैसला मूल ओबीसी समाज के अस्तित्व पर चोट साबित हुआ था और अब समय आ गया है कि इसके खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन भाजपा के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने जिस वर्ग को वादों से साधने की कोशिश की, वही अब उसके खिलाफ सड़कों पर उतरने की तैयारी में है। यदि यह असंतोष व्यापक रूप लेता है तो इसका सीधा असर आगामी शहरी निकाय, पंचायतीराज सहित विधानसभा चुनावों में दिख सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार बलवत सिंह कहते हैं, ‘मूल ओबीसी वर्ग का वर्गीकरण और ओबीसी सूची का पुनरीक्षण केवल आरक्षण का सवाल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समान अवसरों की लड़ाई भी है। अदालत का आदेश होने के बावजूद सरकारों की अनदेखी इस असंतोष को और गहरा कर रही है। 19 अक्टूबर का ‘काला दिवस’ सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि मूल ओबीसी वर्ग की उस पीड़ा और संघर्ष का प्रतीक होगा, जिसे वे पिछले ढाई दशकों से झेल रहे हैं।’

