




अर्चना गोदारा.
दरम्यान की दूरी, पैसा, रिश्ते और समाज की चुप्पी
“दिलों के बीच जो खामोशी है,
वो अक्सर जेब की खनक से बढ़ती जाती है।’
हमारे समाज में रुपया-पैसा अब केवल जीवन चलाने का साधन नहीं रहा, वह अब रिश्तों की परिभाषा भी तय करने लगा है। अब पैसा बताता है कि कौन ‘अपने’ हैं और कौन सिर्फ अवसर के मुसाफिर। लेकिन इस बदलती परिभाषा के बीच एक सवाल बार-बार सिर उठाता है, क्या भावनाओं और संवेदनाओं की भी कोई कीमत है ? पैसा रिश्तों का निर्णायक है या विनाशक?
एक समय था जब गाँव के घरों में शामें चौपालों से सजती थीं। हर घर आपस में एक दूसरे को जानते थे। वे एक दूसरे के सुख दुख में साथ में देते थे। वहाँ ज़रूरी नहीं था कि हर किसी के पास बहुत कुछ हो, पर जो पास होता था, वो खुशी से बाँटा जाता था। आज शहरों में लाखों कमाने वाले लोग भी एक कप चाय अकेले पीते हैं, और वे अपने पड़ोसियों का नाम तक नहीं जानते। या यू कहे कि वे जानना भी नहीं चाहते। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि उन घरों में रहने वाले चार सदस्यों के बीच में भी अपनापन नहीं होता। इसके अतिरिक्त परिवार में रिश्तेदारों में भी अधिक दूरी बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। यानी उनके संबंधों में केवल औपचारिकता मात्र रह गई है। यदि कहीं घनिष्टता या मजबूती है तो वह पद और पैसे का प्रभाव है।
पैसों के चक्कर में अपने पिता से संबंध खराब होने का एक उदाहरण प्रसिद्ध अभिनेत्री अमीषा पटेल का भी है जिनका अपने पिता से बहुत बड़ा विवाद हो गया था। पैसे के खर्च को लेकर परिवार में इस प्रकार का विवाद होना, दुखद एवं हैरानी भरा होता है।
बाँध रखा है रिश्तों को भी हिसाब की रस्सियों से,
अब प्यार भी तौलते हैं लोग, खर्च की नज़रों से।
वर्तमान समाज में पैसा समस्या नहीं, समस्या है उसका प्रभाव। भावनाएँ तब तक पनपती हैं जब तक उनके बीच भरोसे की नमी होती है। पर जब हर संवाद में ‘तुमने कितना दिया’, ‘मैंने क्या किया’, कितना कमाते हो, कितना बचाते हो, कहाँ ले कर जाओगे सब, तुम्हारे पास क्या कमी है, थोड़ा खर्च कर दोगे तो क्या फर्क पड़े जाएगा तुम्हारे, अरे! खुल के खर्च किया करो जिंदगी दो दिन की है, जैसे ताने मारने और व्यंग कसने वाले वाक्य जब तब जुबान पर आने लगते हैं, तब रिश्ते धीरे-धीरे साँस लेना बंद कर देते हैं। उन रिश्तो में गर्माहट और संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। ऐसे ही कई उदाहरण वर्तमान में देखने को मिल जाएंगे जहां एक परिवार में भाइयों के बीच ज़मीन और संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। बचपन साथ बीता था, एक ही थाली में खाना खाया, लेकिन अब वकील का सहारा लिया जा रहा है। एक वृद्ध पिता बैठा यह सब देखता है। लेकिन उसकी आंखों में आंसू नहीं आते हैं, जुबान पर सिर्फ गुस्सा होता है। वे अपने एक बच्चे से आदर की उम्मीद करते हैं और सोचते हैं कि एक बच्चे को ही सारी सम्पत्ति मिल जाए। यह हैरान करने वाला व्यवहार वर्तमान में अपने चर्म पर है क्यों कि कई बार मां-बाप अपने ही बच्चों के साथ अलग-अलग प्रकार का व्यवहार करते हैं। जो बच्चा मेहनती होता है, जिम्मेदारी उठाता है और कमाई करता है, उसे वे यह सोचकर नजरअंदाज करते हैं कि यह तो संभल जाएगा। वहीं जो बच्चा कुछ नहीं करता, उसे ज्यादा ध्यान, प्यार और संपत्ति देने लगते हैं। यह भेदभाव मेहनती बच्चे के मन में दर्द और नफरत भर देता है। उसे लगता है कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। इससे वह धीरे-धीरे मां-बाप और भाई-बहनों से दूर होने लगता है।
भविष्य में यही बच्चे अलग हो जाते हैं और मां-बाप की सेवा से भी दूर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अकेले रह गए मां-बाप के जहन और जुबान में बहुत सारी शिकायतें होती हैं, परन्तु वे अपनी कमियों को कभी उजागर नहीं करते। उसे नजर अंदाज करने का प्रयास करते हैं और उसे अपने बच्चों के ऊपर लाद देते हैं ।
‘दरारें दीवारों में होतीं तो भर जातीं,
ये तो दिलों में पड़ी हैं, कहाँ जाएं?’
व्यवहार में दोगलापन और पैसे के प्रति अत्यधिक मोह यदि किसी भी सदस्य में पाया जाता है तो रिश्तो की गर्माहट दूरी के साथ शुरू हो कर धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। समाज मे बच्चों को यह तो सिखाया जाता है कि ‘कामयाब बनो’, पर यह नहीं सिखाता कि ‘इंसानियत कभी ना छूटे।’ जब रिश्ते भी ‘नेट वर्थ’ और ‘सोशल स्टेटस’ के तराजू पर तौले जाते हैं, तब समाज में धीरे-धीरे आत्मीयता का ह्रास शुरू होता है। परिवार हमेशा प्रेम की धारा पर चलता है। यदि उस धारा में कहीं भी रुकावट आती है तो उसका खंडित होना सत्य है। उदासीनता चाहे माता-पिता की बच्चों के प्रति हो या बच्चों की माता-पिता के प्रति, दोनों ही स्थिति में परिवार को नुकसान होता है। वहां अशांति, झगड़ा, अवसाद, चिंता और बेचौनी भी अपना निवास बना लेते है।
हर उस हाथ में उम्मीद है जो देने से डरता नहीं, हर उस दिल में जीवन है जो सुनना जानता है। परिवर्तन की शुरुआत घर से होती है, थोड़ा समय, थोड़ी संवेदना, और थोड़ा ‘मैं हूँ न’ कह देना बस। क्योंकि
‘पैसा आएगा, जाएगा, रिश्ते अगर छूट जाएं तो लौटते नहीं,
इसलिए थोड़ी मोहब्बत, थोड़ी मोहलत बाँट लोकृये खर्च नहीं होती।’
समाज तब तक जीवित है जब तक उसमें संवेदना की नमी है। पैसा ज़रूरी है, पर उससे भी ज़रूरी है वो भाव जो हमें इंसान बनाते हैं। अगर हम रिश्तों को फिर से संवेदनशीलता, सम्मान और संवाद की ज़मीन पर खड़ा करें, तो शायद दीवारें नहीं, पुल बन सकते हैं।
‘चलो फिर से रिश्तों को महसूस करें,
पैसे से नहीं, पल बाँट कर शुरू करें,
बेटा-बेटी से नहीं,
अपने बच्चे से प्यार करें,
चलो प्यार में जीना शुरू करें।’
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं






