





शंकर सोनी.
राजस्थान की सड़कों पर चलती स्लीपर बसें अब आराम और सुविधा का नहीं, बल्कि भय और लापरवाही का प्रतीक बनती जा रही हैं। हाल ही में हुई दर्दनाक बस दुर्घटना, जिसमें आग लगने से कई निर्दाेष यात्रियों ने अपनी जान गंवाई, ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। यह हादसा केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता का परिणाम है जहाँ मुनाफा मानव जीवन से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा है। सवाल सिर्फ उस एक बस का नहीं, बल्कि पूरे परिवहन तंत्र की विश्वसनीयता पर है, क्या हमारी सड़कों पर चलने वाली बसें सचमुच ‘सुरक्षित’ हैं?

दुर्घटना के बाद जब परिवहन विभाग ने बसों की फिटनेस और सुरक्षा मानकों की जाँच शुरू की, तो बस ऑपरेटरों की हड़ताल और धमकियों ने स्थिति को और भयावह बना दिया। यह रवैया दर्शाता है कि सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता के बजाय विरोध की मानसिकता घर कर गई है। यात्रियों की जान के साथ इस तरह का खिलवाड़ न केवल अमानवीय है बल्कि कानूनन अपराध भी है।

मोटर वाहन अधिनियम 1988, केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 और राजस्थान मोटर वाहन नियम 1990 के तहत प्रत्येक सार्वजनिक वाहन के लिए फिटनेस प्रमाणपत्र अनिवार्य है। फायर एक्सटिंग्विशर, फर्स्ट-एड बॉक्स, आपात निकास, सुरक्षित वायरिंग और पर्याप्त वेंटिलेशन हर बस में होना चाहिए। बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के बस चलाना सीधा-सीधा अपराध है। फिर भी, सड़कों पर रोजाना ऐसी बसें धड़ल्ले से दौड़ती हैं जिनमें ये बुनियादी सुरक्षा सुविधाएँ भी नहीं होतीं।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 106(1) स्पष्ट करती है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी से हुई मृत्यु ‘साधारण दुर्घटना’ नहीं, बल्कि दंडनीय अपराध है। इस अपराध के लिए पाँच वर्ष तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान है। अगर यह लापरवाही जानबूझकर हुई है, तो धारा 105(2) (मानव जीवन को संकट में डालना) और धारा 357(3) (सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा पहुँचाना) के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है। यानी, अब ‘गलती’ कहकर बच निकलने का रास्ता खत्म होना चाहिए।

अधिकांश हादसों की जड़ें एक जैसी होती हैं। पुरानी वायरिंग, अवैध इन्वर्टर या सिलेंडर का उपयोग, स्लीपर कोच में बंद और वेंटिलेशन रहित केबिन, तथा फिटनेस प्रमाणपत्र के नाम पर महज़ औपचारिकता। ‘वीडियो कोच’ और ‘स्लीपर कोच’ बसों में मनमाने बदलाव से यात्रियों को सुविधाओं की जगह मौत का जोखिम परोसा जा रहा है। यह मुनाफे की अंधी दौड़ नहीं, बल्कि लापरवाही की खुली प्रदर्शनी है।

राज्य सरकार को इस संकट को गंभीरता से लेते हुए सभी स्लीपर और वीडियो कोच बसों की डिजिटल फिटनेस ट्रैकिंग प्रणाली लागू करनी चाहिए। जो बसें मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उनके परमिट तुरंत निलंबित किए जाएँ। यही नहीं, हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के विभिन्न जिला मुख्यालयों पर बने इन बस ऑपरेटरों के छोटे बुकिंग दफ्तरों में यात्रियों के बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है। महिलाओं और पुरुषों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव राज्य सरकार की लापरवाही को और उजागर करता है।

सड़क सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक और वाहन संचालक की सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी है। जब तक हर बस ऑपरेटर यह नहीं समझेगा कि ‘नियमों का पालन ही सम्मान की सच्ची राह है,’ तब तक सड़कें सुरक्षित नहीं हो सकतीं। यात्रियों की जान से बड़ा कोई मुनाफा नहीं होता, और जो इसे समझने से इनकार करता है, उसे कानून की सख्ती का सामना करना ही चाहिए।

राजस्थान को अब ‘दुर्घटनाओं के बाद जांच’ की पुरानी आदत छोड़नी होगी। हर बस, हर परमिट और हर चालक को जवाबदेह बनाना होगा। यात्रा सेवा का असली उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा करना है। सवारियों की सुरक्षा ही सबसे बड़ा लाभ है, बाकी सब केवल आंकड़े हैं, जिन्हें किसी भी दिन आग की लपटें निगल सकती हैं।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक व पेशे से अधिवक्ता हैं



