




डॉ. संतोष राजपुरोहित.
जब किसी राष्ट्र की प्रगति की परिभाषा तय की जाती है, तो वहाँ केवल जीडीपी व्यापार या निवेश का ही नहीं, बल्कि उस देश की जनसंख्या की समग्र भागीदारी का भी आकलन किया जाता है। भारत जैसे युवा और विविधतापूर्ण देश के लिए यह भागीदारी तब अधूरी रह जाती है, जब उसकी आधी आबादी, महिलाएँ पूरी तरह से आर्थिक गतिविधियों में सम्मिलित नहीं होतीं। विडंबना यह है कि जिस देश ने मातृशक्ति को देवी का स्वरूप मानकर पूजा है, उसी देश में कार्यस्थलों, उद्यमिता और श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सीमित दायरे में सिमट कर रह गई है।
विकास केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि अवसरों का संतुलन है, और यही संतुलन तब बिगड़ता है जब लैंगिक असमानता, सामाजिक परंपराएं और संस्थागत बाधाएं महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ महिलाएँ केवल घर की नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ बन सकें? अब समय आ गया है कि हम महिलाओं की आर्थिक उपस्थिति को केवल ‘सशक्तिकरण’ की दृष्टि से नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रीय विकास’ की अनिवार्यता के रूप में देखें।
भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी एक जटिल किन्तु अत्यंत आवश्यक विषय है। यद्यपि भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में अनेक प्रयास हुए हैं, फिर भी आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति अब भी अपेक्षाकृत कम है। यह स्थिति केवल सामाजिक दृष्टिकोण से ही नहीं, अपितु आर्थिक विकास की दृष्टि से भी चिंता का विषय है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की उत्पादन क्षमता और समावेशी विकास उसकी सम्पूर्ण जनसंख्या की सहभागिता पर आधारित होता है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एन.एस.ओ.) तथा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पी.एल.एफ.एस.) के अनुसार, भारत में महिला श्रम शक्ति सहभागिता दर लगभग 25 से 27 प्रतिशत के बीच है, जो विश्व औसत (लगभग 48 से 50 प्रतिशत) की तुलना में बहुत कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह सहभागिता अपेक्षाकृत अधिक है, परन्तु वह भी मुख्यतः असंगठित, अल्पवेतन और असुरक्षित कार्यों तक ही सीमित है। शहरी क्षेत्रों में उच्च शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद, उनका कार्यबल में बने रहना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को सीमित करने वाले प्रमुख कारणों में पारंपरिक सामाजिक मान्यताएँ, पारिवारिक उत्तरदायित्व, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव, सुरक्षित यातायात की कमी, मातृत्व अवकाश की सीमित सुविधाएँ तथा कार्य-जीवन संतुलन की समस्याएँ सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त, महिलाएँ प्रायः ‘काँच की छत’ जैसी स्थिति का सामना करती हैं, जहाँ वे किसी पद तक पहुँचने के पश्चात आगे नहीं बढ़ पातीं, चाहे उनकी योग्यता कितनी भी हो।
हाल के वर्षों में महिला स्वरोजगार और उद्यमिता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। नवाचार आधारित योजनाओं और मुद्रा ऋण जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों को वित्तीय सहायता, मार्गदर्शन और संपर्क तंत्र प्रदान करने में सहायता की है। इसके बावजूद, महिला उद्यमियों को ऋण प्राप्त करने, बाज़ार तक पहुँच बनाने और पारिवारिक समर्थन की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। फिर भी, जैसे-जैसे डिजिटल साक्षरता और दूरसंचार तक पहुँच बढ़ रही है, महिलाएँ नये-नये क्षेत्रों, जैसे वस्त्र निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा में सशक्त रूप से प्रवेश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं और पुरुषों के वेतन में विषमता एक और गम्भीर समस्या है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन तथा ऑक्सफैम की रिपोर्टों के अनुसार, समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 20 से 30 प्रतिशत कम पारिश्रमिक प्राप्त होता है। इससे न केवल महिलाओं के आत्मविश्वास को ठेस पहुँचती है, बल्कि यह देश की समग्र उत्पादन क्षमता को भी प्रभावित करता है।

सरकार ने महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने हेतु कई योजनाएँ आरंभ की हैं, जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्टैंडअप इंडिया, जननी सुरक्षा योजना और महिला सहायता हेल्पलाइन। इसके अतिरिक्त, कई राज्य सरकारों ने महिलाओं के लिए कौशल विकास, स्वरोजगार प्रशिक्षण और डिजिटल शिक्षा की व्यवस्था की है। परंतु इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव तभी सम्भव है जब इनका ज़मीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो।
खास बिंदुओं के आधार पर इसका समाधान ढूंढने का प्रयास किया जा सकता है। मसलन, महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध कराना आवश्यक है, जिससे वे विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में आत्मविश्वास से भाग ले सकें। मातृत्व अवकाश, बाल देखभाल केन्द्र (क्रेच) सुविधा और लचीले कार्य समय जैसी नीतियाँ महिलाओं को कार्यक्षेत्र में बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं। सरकारी एवं निजी दोनों क्षेत्रों में कार्यस्थलों को अधिक समावेशी और सुरक्षित बनाने हेतु संवेदनशीलता पर विशेष ध्यान देना होगा। निर्णयकारी पदों पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर समाज में प्रेरणादायक वातावरण निर्मित किया जा सकता है। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी केवल लैंगिक समानता का विषय नहीं है, बल्कि यह समावेशी, सतत और न्यायपूर्ण आर्थिक विकास का मूल आधार है। जब महिलाएँ अर्थव्यवस्था में पूर्ण रूप से भाग लेंगी, तभी भारत एक सशक्त, विकसित और समरस राष्ट्र के रूप में उभर सकेगा। अतः यह आवश्यक है कि नीति-निर्माता, समाज तथा उद्योग क्षेत्र एक साथ मिलकर ठोस प्रयास करें।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




