




डॉ. एमपी शर्मा.
एक कहावत है, ‘ऊत का गुरु जूत’। इसका भाव है कि जब कोई व्यक्ति या शक्ति बार-बार समझाने के बावजूद अपनी हठ और अन्याय से बाज़ न आए, तो उसका इलाज कठोर कदम उठाकर ही किया जा सकता है। यह सिद्धांत केवल गाँव, गली की ज़िंदगी में ही नहीं, बल्कि इतिहास, धर्म और आधुनिक समाज सभी में चरितार्थ होता रहा है।

त्रेता युग में जब रावण, खर-दूषण और बाली जैसे दुष्टों ने अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी, तब भगवान राम ने उन्हें न्याय के लिए अपने बाणों से शांत किया। द्वापर युग में शिशुपाल को श्रीकृष्ण ने 100 अपराधों तक सहन किया, पर जब उसने मर्यादा की सीमा पार कर दी तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत कर दिया। कंस और जरासंध जैसे आततायी भी बार-बार समझाने से नहीं माने, और अंततः उनका वध ही समाज की रक्षा का एकमात्र मार्ग बना।

इतिहास के पन्ने में इस कदर के कई उदाहरण मौजूद हैं। मसलन, अशोक महान ने कलिंग युद्ध के पहले कठोरता दिखाई और जब समझ में आया कि अकारण हिंसा से समाज नष्ट हो रहा है, तो उन्होंने खुद को बदल लिया। महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज ने मुग़लों और अत्याचारियों से बार-बार संवाद का प्रयास किया, पर जब शत्रु समझने को तैयार नहीं हुए, तो तलवार उठानी पड़ी। अंग्रेज़ों के विरुद्ध भी भारत ने लंबे समय तक संवाद और निवेदन की नीति अपनाई, पर जब दमन और लाठियाँ बढ़ीं तो 1857 की क्रांति और बाद में असहयोग आंदोलनों का स्वरूप कठोर होता गया।

आज के समय में भी हम देखते हैं कि जब उग्रवादी, आतंकवादी और देशविरोधी ताकतें समझाने पर नहीं मानतीं, तो सर्जिकल स्ट्राइक और कठोर सैन्य कार्रवाई ही समाधान बनती है। पुलिस प्रशासन भी कई बार अपराधियों को सुधारने की कोशिश करता है, पर जब अपराध की सीमा पार हो जाती है, तो ‘जूत’ यानी कठोर दंड ही काम आता है।

समाज में भी यदि कोई व्यक्ति या गिरोह बार-बार उत्पात मचाता है, तो अंततः लोग संगठित होकर उसका इलाज कर देते हैं। यह कहावत हमें सिखाती है कि धैर्य और समझाना हमेशा पहला उपाय होना चाहिए। परंतु जब अत्याचार और अन्याय मर्यादा तोड़ दे, तब कठोरता ही धर्म बन जाती है। दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज की रक्षा है।

संक्षेप में, ‘ऊत का गुरु जूत’ कहावत केवल कठोरता की वकालत नहीं करती, बल्कि यह चेतावनी देती है कि अन्याय करने वाले लोग अगर समय रहते न संभलें, तो उन्हें कठोर दंड भुगतना ही पड़ेगा। यही न्याय का शाश्वत सिद्धांत है, ‘जहाँ समझाने से काम न चले, वहाँ दंड ही अंतिम शिक्षक होता है।’
-लेखक सामाजिक चिंतक, पेशे से सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं


