



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंध एक बार फिर तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका ने भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की लगातार खरीद को लेकर असंतोष जताते हुए भारतीय निर्यात वस्तुओं पर 25 फीसद टैरिफ लगाया है और आगे इसे 250 फीसद तक बढ़ाने की धमकी दी है। यह कदम न केवल व्यापारिक संबंधों में कटुता ला सकता है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक रणनीतिक साझेदारियों और आर्थिक नीति को भी प्रभावित कर सकता है।
यूक्रेन युद्ध के पश्चात अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए और रूस से ऊर्जा खरीद को सीमित करने की मांग की। भारत ने इन प्रतिबंधों का औपचारिक रूप से समर्थन नहीं किया, और रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। भारत की यह रणनीति उसके ऊर्जा सुरक्षा हितों से जुड़ी है। 2022-23 में भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात 10 गुना तक बढ़ाया, जिससे भारत की ऊर्जा लागत में उल्लेखनीय कमी आई। इससे भारतीय रिफाइनरियों को सस्ती आपूर्ति मिली और उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थायित्व मिला। अमेरिका का मानना है कि भारत द्वारा रूस से इस प्रकार की खरीद, रूस को अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ पहुँचा रही है और यह उसकी भू-राजनीतिक रणनीति के विरुद्ध है। भारत से कपड़ा, स्टील, रसायन, इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात पर पहले से ही अमेरिका 25 फीसद टैरिफ की घोषणा कर चुका है। अगर यह 250 फीसद तक बढ़ा, तो भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता घटेगी और अमेरिका को होने वाला निर्यात घट सकता है। वर्तमान में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, 2023 में भारत ने लगभग 83 बिलियन डॉलर का निर्यात अमेरिका को किया था।

व्यापार तनाव बढ़ने से अमेरिकी निवेशकों की भारत में रुचि घट सकती है, जिससे एफडीआई प्रवाह और मुद्रा विनिमय दर पर दबाव आएगा। रुपये में अवमूल्यन की संभावना बढ़ सकती है, जिससे आयात महंगे हो सकते हैं। भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी, क्वाड, टेक्नोलॉजी सहयोग जैसे क्षेत्रों में अविश्वास पनप सकता है। इससे डिफेंस सेक्टर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे सहयोग भी प्रभावित हो सकते हैं।

भारत की प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा है। प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अब भी वैश्विक औसत से कम है, और विकास हेतु सस्ती ऊर्जा आवश्यक है। भारत को रूस से तेल खरीदना वैधानिक और वैध अधिकार है, क्योंकि वह अमेरिकी प्रतिबंधों को अनिवार्य नहीं मानता। इस प्रकार भारत को अपनी स्वायत्त रणनीति पर कायम रहना चाहिए। भारत को अमेरिका के साथ डिप्लोमेसी और रणनीतिक संवाद को मजबूत करना चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि रूस से तेल खरीदना अमेरिका के खिलाफ नहीं बल्कि भारत की आवश्यकताओं से प्रेरित है। भारत यह भी दर्शा सकता है कि रूस से खरीदे गए तेल का एक बड़ा हिस्सा रिफाइन होकर अन्य देशों को निर्यात होता है, इसमें अमेरिका भी शामिल है। भारत को अपने निर्यात गंतव्यों का विविधीकरण करना चाहिए। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों पर फोकस बढ़ाया जाए। मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौतों से व्यापार विकल्पों को बढ़ाया जा सकता है। घरेलू उद्योगों को सब्सिडी या टैक्स रिबेट देकर अमेरिका के उच्च टैरिफ का प्रभाव कम किया जा सकता है।

भारत को दीर्घकाल में हरित ऊर्जा, हाइड्रोजन मिशन, सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को गति देनी होगी जिससे विदेशी तेल पर निर्भरता घटे। इससे भविष्य में इस प्रकार के संकटों से बचा जा सकेगा। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव की यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। भारत को जहां अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी है, वहीं अमेरिका के साथ संबंधों को बिगड़ने से भी बचाना है। यह संतुलन केवल व्यापक कूटनीतिक संवाद, आर्थिक लचीलापन और रणनीतिक दीर्घदृष्टि से संभव है। वर्तमान संकट भारत के लिए आत्मनिर्भरता, निर्यात विविधीकरण और हरित ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ने का एक अवसर भी है। इस संदर्भ में भारत को सटीक, तटस्थ और देशहित में आधारित नीति अपनानी चाहिए।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं


