




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने जिम्मेदारी संभालते ही साफ कर दिया कि सरकार की नई कार्यशैली दो मजबूत स्तंभों पर टिकेगी, आमजन का डिजिटल सशक्तिकरण और टेक्नोलॉजी के जरिए प्रशासन की रफ्तार बढ़ाना। सत्ता बदलने पर अक्सर चीजें धीमी हो जाती हैं, पर इस बार पहली तबादला सूची देखकर साफ हुआ कि सिस्टम को उलझाने का इरादा नहीं है। अतिरिक्त प्रभार शून्य, विभागों का सीधा-सादा इंटीग्रेशन, और एक तरह से प्रशासन को ‘पतला लेकिन तेज’ बनाने की कोशिश।

वे जिस आत्मविश्वास से कहते हैं कि शिकायत निवारण की गुणवत्ता सुधरी तो जनता का भरोसा बढ़ेगा, उसकी जड़ें उनके पिछले अनुभवों में हैं। संपर्क पोर्टल पर रोज 20 लाख कॉल आते हैंकृयह संख्या बताती है कि लोग सरकार से संवाद करना चाहते हैं, बस चैनल सुगम होना चाहिए। वे कहते हैं कि सरकारी संस्थाओं का ट्रांसफॉर्मेशन तभी मुमकिन है जब व्यवस्था जनता को समय पर और सरल सेवा दे सके। यही वजह है कि अब सर्विस डिलीवरी की स्पीड और गुणवत्ता दोनों बढ़ाने की तैयारी है।
उनकी सोच काफी स्पष्ट है, हर कर्मचारी और अधिकारी अपनी अधिकतम क्षमता से काम करे। प्रशासन कोई जादुई मशीन नहीं है, पर इसे तकनीक की मदद से ज्यादा जिम्मेदार और पारदर्शी बनाया जा सकता है। आमजन की संतुष्टि को केंद्र में रखकर वे नवाचार लाने की बात करते हैं। यानी ‘काम हो भी और दिखे भी’ यही विज़न है।

सरकार ने चार प्रमुख प्राथमिकताएँ तय की हैं, गरीब, युवा, किसान और नारी शक्ति। इन चारों समूहों तक प्रभावी लाभ पहुंचाने के लिए वे छोटे-छोटे सरकारी कामकाज को सरल बनाने में जुटे हैं। उनका कहना है कि तकनीक के माध्यम से ऐसे सिस्टम तैयार होंगे जिनसे भ्रष्टाचार कम होगा, पारदर्शिता बढ़ेगी और लोगों को सेवाएँ समय पर मिलेंगी। यह सब सुनकर अंदाजा लगता है कि अगला दौर ‘सरलीकरण बनाम जटिलता’ का नहीं, बल्कि ‘कार्यक्षमता बनाम सुस्ती’ का होगा।

वे केंद्र सरकार के विकसित भारत-2047 विजन का जिक्र भी करते हैं। दिल्ली में ‘सेक्टरल ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज’ मॉडल अपनाया गया थाकृजहाँ अलग-अलग विभाग मिलकर एक ही लक्ष्य पर काम करते थे। श्रीनिवास ने राजस्थान में भी यही मॉडल लागू कर दिया है। यह विकसित राजस्थान-2047 विजन डॉक्यूमेंट का आधार बनेगा। 10 सेक्टर तय किए गए हैं और प्रत्येक सेक्टर में कई विभागों को जोड़ दिया गया है। कृषि सेक्टर का उदाहरण लें, कृषि, पशुपालन, मत्स्य, डेयरी, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सभी अब संयुक्त रूप से एक लक्ष्य पूरा करेंगे। यानी विभाग अब ‘अलग-अलग दफ्तर’ नहीं, बल्कि ‘एक टीम’ की तरह काम करेंगे।

इंटीग्रेटेड सिस्टम बनाने के लिए विभागों का विलय भी किया जा रहा है। स्वास्थ्य और मेडिकल एजुकेशन को एक साथ लाना, प्लानिंग और आईटी को जोड़ना, ये कदम उसी दिशा में हैं। उनका दावा है कि इस तर्ज पर काम करने से 25 प्रमुख सचिव स्तर के पदों की ज़रूरत ही समाप्त हो जाती है। यह बात प्रशासनिक मशीनरी को हल्का और चुस्त बनाने के लिए काफी मायने रखती है। इंटर-डिपार्टमेंटल को-ऑर्डिनेशन की कमी अक्सर सिस्टम को धीमा करती है। पर्यावरण और खनन विभाग के बीच खींचतान, रोड सेफ्टी में पुलिस, पीडब्ल्यूडी, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ चारों के बीच असंतुलन, ये पुराने झंझट हैं।

श्रीनिवास कहते हैं कि सामान्य को-ऑर्डिनेशन मीटिंग से इनका हल नहीं निकलेगा; इसके लिए मुख्य सचिव की सक्रिय भूमिका ज़रूरी है, और वे खुद उसमें जुटे हैं। यह बताता है कि वे फाइलें पास करने वाले मुख्य सचिव नहीं, मैदान में उतरकर मुद्दा सुलझाने वाले अधिकारी हैं। उनकी कार्यशैली का सबसे मजबूत पहलू है, मैदानी अनुभव। एम्स में रहते रोजाना पच्चीस हजार मरीजों से मिलना, राजस्व मंडल में पाँच हजार किसान रोज मिलना, और लगातार यात्रा करना, ये सब उन्हें जमीन की नब्ज़ पकड़ने की क्षमता देता है। वे कहते हैं कि उन्होंने करीब 60 हजार किसानों से एक ही सवाल पूछा, कौनसी प्रक्रियाएँ सरल की जानी चाहिए? इतना बड़ा सैंपल साइज किसी भी नीति-निर्माता को असली फोटो दिखा देता है।

उनकी बातों का सार यह है कि राजस्थान की प्रशासनिक मशीनरी अब ‘कागज के पहाड़’ से निकलकर ‘डिजिटल चक्र’ की ओर बढ़ेगी। नई व्यवस्था की रीढ़ तकनीक होगी और उद्देश्य होगा, कम से कम समय में, कम से कम परेशानी के साथ, आम जनता तक सेवाएँ पहुँचाना। सरकार का विजन बड़ा है, विकसित राजस्थान। और इसे पाने का रास्ता उनकी नजर में सिर्फ एक है, सरलीकरण, पारदर्शिता, और तेज प्रशासन। राजस्थान की नौकरशाही लंबे समय से अपने ढर्रे में चलती आई है। यह परिवर्तन आसान नहीं होगा, पर अगर इरादे ठोस हों और सिस्टम सही दिशा में धकेला जाए, तो पहिया घूमता है। आगे का समय बताएगा कि यह नया मॉडल कितनी गहराई तक उतरता है, लेकिन अभी जो गति दिख रही है, वह उम्मीद जगाती है।



