




डॉ. एमपी शर्मा.
विमान जैसे-जैसे नीचे उतरा, खिड़की के बाहर फैला हरा समंदर दिल में उतर गया। पहाड़ों की नरम रेखाएँ, बीचों-बीच इठलाती नदी और चमकते समुद्र के किनारे बसा शांत-सा शहर, नागासाकी। पहली नज़र में किसी पोस्टकार्ड जैसा खूबसूरत, लेकिन इस सुंदरता के भीतर दबी है वह चुप्पी, जिसे दुनिया ने 9 अगस्त 1945 को गहरे जख्म की तरह देखा था। यही शहर मेरा स्वागत कर रहा था, इतिहास के बोझ के साथ, और उम्मीद की ठंडी हवा के साथ।

यह मेरा जापान का पहला दौरा था। हम आईपीपीएनडब्ल्यू के 24वें विश्व सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे, जो 1 से 5 अक्टूबर 2025 तक आयोजित हुआ। सम्मेलन एक तरफ़ था, लेकिन मन में दूसरी ख्वाहिश धड़क रही थी, नागासाकी को महसूस करना। वह शहर, जिसे कभी एक पल में राख में बदल दिया गया, और जो आज दुनिया को अमन की ओर बढ़ने का सबक देता है।
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही लगा जैसे ताज़ी हवा सीधे फेफड़ों में उतर रही हो। सड़कों पर इतना अनुशासन, इतनी सफाई कि मन अपने-आप झुक जाए। कोई हॉर्न नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं। मानो शहर कह रहा हो, शांति पहले, गति बाद में।

होटल पहुँचा तो जापानी मेहमान नवाजी ने मन जीत लिया। मुस्कुराहट जैसे उनकी यूनिफॉर्म का हिस्सा हो। छोटा-सा कमरा, पर इतनी सफाई कि किसी कोने में धूल का एक कण ढूँढ़ना भी चुनौती। वॉशरूम तो तकनीक की शांत कविता जैसा, गर्म सीट वाला कमोड, ऑटोमेटिक जेट, सेंसर फ्लश। लगा जैसे मशीनें भी यहाँ संस्कार सीखकर चलती हैं।

नागासाकी सदियों से जापान का दुनिया की ओर खुला दरवाज़ा रहा है, चीन, पुर्तगाल और यूरोप से व्यापार, संस्कृति और स्वाद यहीं से अंदर आए। शहर की इमारतों, बाज़ारों और खान-पान में यह रंगीन असर साफ झलकता है। चाइनाटाउन की गलियाँ तो मानो जीवित पेंटिंग हों, लाल लालटेनें, महकता खाना, दुकानें और धीमी-सी गहमागहमी।

यहाँ की हवा में हमेशा हल्की नमी रहती है। शायद समुद्र की देन, शायद इतिहास का बोझ, या शायद दोनों का मिश्रण। नागासाकी का खाना भी वैसा ही, जापानी सादगी, चीनी स्वाद और यूरोपीय टेक्सचर। चम्पोन के मोटे नूडल्स, समुद्री भोजन और सब्ज़ियों का घालमेल; कस्टेला केक की पुर्तगाली मिठास; और काकुनी मन्ज़ू का नरम बना हुआ मांस, सबमें संस्कृति की कहानी छिपी है। हाँ, वेजिटेरियंस के लिए थोड़ी मशक्कत जरुर है, पर साफ-सुथरे स्वाद में कोई मिलावट नहीं।

अगले दिन पीस पार्क पहुँचे, वह ज़मीन जहाँ 1945 में दुनिया ने दूसरा परमाणु विस्फोट देखा था। पार्क में कदम रखते ही चुप्पी कानों में भर गई। पेड़ों की सरसराहट भी धीमी लग रही थी, जैसे वह दिन आज भी हवा में तैरता हो। बीच में खड़ी पीस स्टैच्यू, एक हाथ आसमान की तरफ़ उठाकर परमाणु खतरे की चेतावनी देता, दूसरा हाथ शांति की राह दिखाता। कुछ देर वहाँ बैठने के बाद लगा जैसे समय खुद रुककर सिर झुका रहा है।

पास ही एटम बम संग्रहालय है। अंदर जाते ही एक ठंडा, भारी सन्नाटा दिल पर बैठ जाता है। सबसे पहले दिखती है वो घड़ी, जो 11.02 पर रुक गई। उसी वक्त बम गिरा था। इसके बाद तस्वीरें, जली दीवारें, राख बने इंसान, एक माँ जो अपने बच्चे को ढँकने की कोशिश में खुद भी हवा हो गई। इतिहास किताबों में जितना काला दिखता है, यहाँ उससे कई गुना घना महसूस होता है।
म्यूज़ियम में अमन की रंगीन लालटेनें एक उम्मीद की लौ जैसी चमकती हैं, हर लालटेन पर लिखा एक संदेश, ‘नेवर अगेन, पीस।’ मैंने भी एक लालटेन पर लिखा, ‘नागासाकी दुनिया का आखिरी परमाणु बम झेलने वाला शहर रहे।’

नागासाकी घूमने का सबसे शानदार तरीका है इसकी ट्राम। छोटी, शांत, समय की पाबंद, और भीतर ऐसी घोषणा कि आवाज़ संगीत जैसी लगे। ड्राइवरों की ट्रेनिंग में आवाज़ के स्वर की शिक्षा भी शामिल होती है, यह बात सुनकर लगा, सभ्यता का स्तर आवाज़ से भी मापा जाता है। भाषा की दिक्कतें जरूर आती हैं। छोटी दुकानों में अंग्रेज़ी लगभग गायब। लेकिन कुछ जापानी शब्द, मुस्कान और ट्रांसलेशन ऐप, और रास्ते खुलते जाते हैं।

शाम को हम रोपवे से माउंट इनासायामा की चोटी पर पहुँचे। जैसे-जैसे रोपवे ऊपर जाता, शहर नीचे रोशनी की नदी बनकर चमकने लगता। ऊपर पहुँचकर जो दृश्य खुला, उसे शब्द पकड़ ही नहीं पाते। बंदरगाह की चमक, गलियों की रोशनियाँ, लाइटों से झिलमिलाती नावें, नागासाकी मानो सितारों की चादर ओढ़ लेता है। दुनिया के तीन सबसे खूबसूरत रात्रि-दृश्यों में इसे जो जगह मिली है, वह पूरी तरह सही महसूस हुई। रात को होटल की खिड़की से चमकते शहर को देखते हुए एक बात दिल में उतर गई, अमन हमेशा शोर में नहीं, खामोशी में पनपता है।

नागासाकी की यही खामोशी दुनिया को याद दिलाती है कि यह शहर आखिरी गवाह होना चाहिए, उस पागलपन का, जो इंसान को राख में बदल देता है। नागासाकी सिर्फ़ एक शहर नहीं, यह उम्मीद की वह सीख है जो इतिहास की राख पर खड़ी होकर कहती है, खामोशी से बड़ा कोई सबक नहीं।
-लेखक सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



