






गोपाल झा.
कभी समाज की रीढ़ कहा जाने वाला ‘मध्यम वर्ग’ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां न आगे कोई स्पष्ट रास्ता है और न पीछे लौटने की गुंजाइश। वह न निम्न वर्ग की तरह योजनाओं का लाभार्थी है, न उच्च वर्ग की तरह विशेषाधिकार संपन्न। वह उस सन्नाटे का नाम है, जो चीखना चाहता है, पर जिसकी आवाज़ को कोई सुनने वाला नहीं। वह उस अजनबी का नाम है, जो भीड़ में होते हुए भी अकेला है। और यही उसकी सबसे बड़ी विडंबना है।
भारत जैसे देश में, जहां आर्थिक नीतियां या तो गरीबों के वोटबैंक को ‘मुफ्तखोरी’ के जाल में फंसा रही हैं या फिर कॉरपोरेट्स की जेबें भरने के लिए बनाई जा रही हैं, वहां मध्यम वर्ग निरीह दृष्टि से सत्ता की ओर ताकता रह जाता है। उसी सत्ता की ओर, जिसके वित्त मंत्री ने बड़े बेपरवाह लहजे में कह दिया था, ‘मिडिल क्लास को सरकार से ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए।’
पर क्या उम्मीद करना कोई अपराध है? क्या वह वर्ग, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को खड़ा रखने के लिए वर्षों टैक्स चुकाया, अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए नींदें कुर्बान कीं, स्वास्थ्य और भविष्य की गारंटी के लिए बीमा पॉलिसियों में उम्र गँवा दी, उसे अब यह भी नसीब नहीं कि वह सरकार से सवाल पूछ सके?
आज मध्यम वर्ग की हालत उस मोर जैसी हो गई है, जो नाच तो दिखाता है, पर बारिश में भीग नहीं पाता। एक ओर उसकी तनख्वाह सीमित है, दूसरी ओर सपने अनंत। एक तरफ उसकी आवश्यकताएं हैं, दूसरी तरफ विज्ञापनों और सामाजिक प्रतिस्पर्धा से उपजे दिखावे का बोझ। अब यह वर्ग ‘मितव्ययी’ नहीं रहा। अब यह वर्ग ‘सहिष्णु’ तो है, पर विवेकशील नहीं। यह वर्ग अपनी आत्मा गिरवी रख चुका है, ईएमआई के हवाले। बैंक की लोन पॉलिसियां उसकी नई नियति बन चुकी हैं। महंगे मोबाइल, चार पहियों वाली चमचमाती कारें, मॉल्स में खरीदी गई जिंदगी और इंस्टाग्राम पर सजी छुट्टियों की तस्वीरें, ये सब मिडिल क्लास की नई पहचान हैं।

लेकिन यह दिखावा किस कीमत पर?
‘ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत’ की व्याख्या अब ‘ऋणं कृत्वा ब्रांडेड जिएं’ बन चुकी है। अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार आज कर्ज में हैं। होम लोन, कार लोन, एजुकेशन लोन, पर्सनल लोन। एक लोन खत्म होता नहीं कि दूसरा सिर पर सवार हो जाता है। बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, पर संस्कार और संतोष के पाठ गायब हैं। माता-पिता 60 की उम्र में रिटायर नहीं, रिफाइनैंस में उलझे हैं। और युवा? वे फ्रीलांसिंग की दुनिया में स्थायित्व की तलाश कर रहे हैं।
यह वर्ग न तो सरकार की प्राथमिकता है, न मीडिया का मुद्दा। न इसके लिए आंदोलन होते हैं, न मंचों पर भाषण। यह वर्ग मानों चुपचाप सब सहने के लिए ही बना हो। जब पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ते हैं, तब यह थोड़ी देर भुनभुनाता है, फिर चुप हो जाता है। जब महंगाई बेलगाम होती है, तब यह अपने बजट को समेटता है, पर फिर भी टैक्स देता रहता है।
यह वर्ग आत्महत्या नहीं करता, पर भीतर ही भीतर रोज़ मरता है। यह सुसाइड नोट नहीं लिखता, पर हर माह की सैलरी स्लिप उसके जीवन का ‘अधूरा जीवनवृत्त’ बन चुकी है। यह नारे नहीं लगाता, पर उसके सपने हर दिन किसी न किसी नीति की चक्की में पिसते रहते हैं।

विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मध्यम वर्ग अपनी इस चुप्पी से संतुष्ट है? क्या उसकी सहिष्णुता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है? क्या अब समय नहीं आ गया कि वह ‘टुकुर-टुकुर देखने की आदत’ से बाहर निकले?
मध्यम वर्ग को अब सजग होना होगा। यह सजगता विरोध की चीख नहीं, आत्मावलोकन की आवाज़ होगी। उसे समझना होगा कि संतुलित जीवन ही सच्ची सफलता है, और प्रदर्शन से ज़्यादा ज़रूरी है स्थायित्व। उसे शिक्षित होना होगा, आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से और राजनीतिक रूप से।
उसे समझना होगा कि सरकारें वोटबैंक से चलती हैं, लेकिन देश रीढ़ से। और रीढ़ अगर कमज़ोर पड़ गई, तो देश भी सीधे खड़ा नहीं हो सकेगा। मध्यम वर्ग को अपनी संख्या का अहसास करना होगा, और उस संख्या की शक्ति को संगठित कर संवाद में बदलना होगा।
आज वक्त है कि यह वर्ग फिर से अपनी भूमिका को परिभाषित करे, एक ‘उपभोक्ता’ नहीं, एक ‘निर्माता’ के रूप में। वह जो अपने बच्चों को केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, देश को दिशा देने के लिए तैयार करे। वह जो अपने टैक्स के हक की बात निर्भीक होकर करे। वह जो ईएमआई की दौड़ से हटकर संतोष की राह चुने।
क्योंकि अगर यह वर्ग आज नहीं जागा, तो कल इतिहास उसकी चुप्पी को उसकी सहमति मान लेगा। और तब शायद शिकायत करने के लिए भी कोई मंच शेष न बचे। ‘मध्यम वर्ग होना अब कोई वर्ग नहीं, एक संघर्ष है, रोज़ का, भीतर का, और बहुत कुछ खो देने का।’
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं




