






भटनेर पोस्ट डेस्क.
हनुमानगढ़ जंक्शन के हनुमानगढ़ इंटरनेशनल स्कूल का प्रांगण 30 अगस्त को सुर और ताल की अद्भुत छटा से सरोबार था। अवसर था स्पिक मैके के तहत आयोजित विशेष कार्यक्रम, जिसमें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वायलिन वादक उस्ताद जौहर अली ने अपनी कला से बच्चों और श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की मोहक दुनिया में पहुँचा दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत राग अहिर भैरव से हुई। वायलिन की ध्वनियाँ वातावरण में जैसे ही गूंजीं, सभी उपस्थित श्रोता ध्यानावस्थित हो उठे। इसके बाद जब उन्होंने ‘रघुपति राघव राजा राम’ की धुन वायलिन पर सजाई, तो पूरा माहौल भक्ति रस में सराबोर हो गया। पश्चिम बंगाल और राजस्थान की लोकधुनों पर उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं की दाद बटोरी। और फिर आया वह क्षण, जब उनके वायलिन से ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ की धुन गूँजी, बच्चों की आँखों में राष्ट्रप्रेम की चमक कौंध उठी, मानो संगीत ने उनके मन में देशभक्ति की धारा प्रवाहित कर दी हो। वायलिन की इन अद्भुत प्रस्तुतियों में संगत कर रहे थे प्रसिद्ध तबला वादक आसीफ़ अली, जिनकी थाप ने पूरे कार्यक्रम को और भी जीवंत कर दिया।

प्रस्तुति के बीच उस्ताद जौहर अली ने बच्चों से संवाद भी किया। उन्होंने संगीत के सात स्वरों और वायलिन के चार तारों की विशेषताओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि वे परंपरागत भारतीय संगीत परिवार से ताल्लुक रखते हैं, पटियाला-रामपुरा घराने से जुड़े हैं और आकाशवाणी में अप्रूढ़ कलाकार रहे हैं। उन्होंने बच्चों को यह भी बताया कि उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान के लिए संगीत दिया है और विश्व के अनेक देशों में भारतीय संगीत को पहुँचाया है। वर्तमान में वे इंग्लैंड में भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता स्कूल की प्रिंसिपल रेखा तनेजा ने की। नगरपरिषद के पूर्व सभापति सुमित रणवा, शिक्षाविद् डॉ. संतोष राजपुरोहित और नवज्योति विशेष महाविद्यालय की प्रिंसिपल डॉ. पायल गुम्बर बतौर अतिथि शामिल हुए।

पूर्व सभापति सुमित रणवा ने कहा, ‘स्पिक मैके का यह प्रयास सराहनीय है। इस प्रकार के आयोजन बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की ओर प्रेरित करते हैं। भारतीय संगीत साधना पर आधारित है और साधना से ही प्रवीणता आती है। यही संगीत व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ने का अद्भुत सामर्थ्य रखता है।’

डॉ. संतोष राजपुरोहित ने कहा, ‘हनुमानगढ़ की धरती कला-प्रेमियों की रही है। यहाँ के लोग कलाकारों को उनके रियाज़ और साधना के लिए सम्मान देते हैं। कलाकार केवल अपनी कला से नहीं, बल्कि निरंतर साधना से महान बनते हैं।’

संस्था निदेशक भारतेंदु सैनी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि विद्यालय में शिक्षा के साथ-साथ सहशैक्षिक गतिविधियों पर भी विशेष बल दिया जाता है। संगीत की शिक्षा बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने में मदद करती है। उन्होंने उस्ताद जौहर अली का आभार जताते हुए कहा कि उनकी प्रस्तुति बच्चों के लिए अविस्मरणीय अनुभव रही।

कार्यक्रम के अंत में स्पिक मैके के सचिव मनीष जांगिड़ ने आभार जताते हुए कहा कि स्पिक मैके द्वारा समय-समय पर बच्चों के बीच अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को आमंत्रित कर प्रस्तुतियाँ कराई जाती हैं और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। “हमारा उद्देश्य है कि बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराइयों से जोड़ा जाए और उनकी जिज्ञासाओं का समाधान हो।”

कार्यक्रम का संचालन रामनिवास मांडण ने किया। विद्यालय के स्टाफ सदस्य, छात्र-छात्राएँ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे और उन्होंने संगीत से जुड़ी अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पाया। मांडण ने कहाकि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय संगीत की आत्मा से साक्षात्कार का क्षण था। वायलिन की लहरियों ने जहाँ भक्ति का स्वर छेड़ा, वहीं राष्ट्रप्रेम का उद्गार भी किया। यह संध्या इस बात का साक्ष्य बनी कि शास्त्रीय संगीत न केवल कानों का रस है, बल्कि आत्मा का साधन भी है और हनुमानगढ़ की इस धरती ने उस दिन इस साधना को अनुभव किया।


