




डॉ. संतोष राजपुरोहित.
आज के युग में जब हम ‘डिजिटल क्रांति’ शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उसका केंद्र बिंदु निर्विवाद रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) है। हाल ही में भारत में आयोजित ‘ग्लोबल इंडिया एआई समिट’ ने वैश्विक पटल पर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शक बनने की ओर अग्रसर है जो मशीनी बुद्धिमत्ता को मानवीय संवेदनाओं के साथ पिरोने का साहस रखता है। एआई को लेकर अक्सर यह आशंका जताई जाती है कि क्या मशीनें इंसान की जगह ले लेंगी? भारत में हुए इस शिखर सम्मेलन का मूल स्वर इस डर के विपरीत था। यहाँ चर्चा ‘प्रतिस्थापन’ पर नहीं, बल्कि ‘संवर्धन’ पर केंद्रित रही। मानवीय पहलू वह धुरी है जिस पर एआई का भविष्य टिका है। एल्गोरिदम गणना तो कर सकता है, लेकिन वह ‘विवेक’ और ‘न्याय’ की अवधारणा से अनभिज्ञ है। भारतीय दृष्टिकोण यह है कि एआई को एक ‘डिजिटल सहायक’ की भूमिका निभानी चाहिए, न कि एक ‘अधिनायक’ की।

भारत जैसे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में एआई की सफलता उसकी संवेदनशीलता में निहित है। शिखर सम्मेलन में ‘भाषिणी’ जैसे प्रोजेक्ट्स की सफलता इस बात का प्रमाण है कि एआई अब केवल अंग्रेजी बोलने वाले शहरी तबके तक सीमित नहीं है। जब एक मशीन देश की 22 आधिकारिक भाषाओं और अनगिनत बोलियों को समझने लगती है, तो वह केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक समावेश का माध्यम बन जाती है। तकनीकी संवेदनशीलता का अर्थ केवल भाषा तक सीमित नहीं है। इसमें डेटा की निजता और डिजिटल संप्रभुता भी शामिल है। भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम इस बात की पुष्टि करता है कि तकनीक का विकास मानवीय गरिमा और अधिकारों की कीमत पर नहीं होगा।

भारत ने एआई को एक मिशन के रूप में स्वीकार किया है। इस दिशा में सरकार और उद्योग जगत के बीच एक स्पष्ट तालमेल दिखाई देता है, ’इंडिया एआई मिशन’रू सरकार ने इस क्षेत्र के लिए 10,372 करोड़ रुपए से अधिक के बजट का प्रावधान किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य स्वदेशी कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करना है।

शिखर सम्मेलन में प्रस्तुत डेटा के अनुसार, एआई का उपयोग करके भारत के दूरदराज के इलाकों में कैंसर की शुरुआती स्क्रीनिंग और किसानों के लिए सटीक मौसम पूर्वानुमान अब एक वास्तविकता बन रहे हैं। भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए, अगले तीन वर्षों में लगभग 3 लाख युवाओं को एआई के नैतिक उपयोग और विकास में प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।
जहाँ तकनीक अवसर लाती है, वहीं चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। ‘डीपफेक’ और ‘एल्गोरिथमिक बायस’ (पक्षपात) जैसे मुद्दे आज मानवीय संवेदनशीलता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। शिखर सम्मेलन में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि यदि एआई के पास मानवीय संवेदनाओं का ‘फिल्टर’ नहीं होगा, तो यह समाज में भ्रामक सूचनाओं और भेदभाव का प्रसार कर सकता है। भारत ने यहाँ सुरक्षित और विश्वसनीय एआई का वैश्विक आह्वान किया है, ताकि तकनीक का उपयोग विनाश के बजाय केवल लोक कल्याण के लिए हो।

अंततः, भारत में आयोजित यह एआई शिखर सम्मेलन इस बात का प्रतीक है कि भविष्य केवल ‘इंटेलिजेंस’ का नहीं, बल्कि ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) का है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में जब तक मानवीय स्पर्श, करुणा और नैतिकता का समावेश नहीं होगा, वह अधूरी है। भारत दुनिया को यह सिखा रहा है कि तकनीक को ‘मस्तिष्क’ तो दिया जा सकता है, लेकिन उसे ‘हृदय’ देना हमारा उत्तरदायित्व है। एक ऐसी मशीन जो इंसान के आँसू न पोंछ सके, वह शायद गणना में तो श्रेष्ठ हो सकती है, पर विकास की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती।






