



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
भारत में आरक्षण की बहस दशकों से सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक असमानताओं के संदर्भ में होती रही है। परंतु बदलती आर्थिक संरचना, शिक्षा की बढ़ती लागत, सीमित सरकारी अवसरों और तीव्र प्रतिस्पर्धा ने इस विमर्श को एक नया आयाम दे दिया है। आज यह प्रश्न अधिक मुखर हो रहा है कि क्या सामान्य वर्ग, जिसे परंपरागत रूप से संपन्न और अवसर-संपन्न माना जाता रहा, वास्तव में वर्तमान परिस्थितियों में उतना ही सशक्त है जितना समझा जाता है? शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी दर, उच्च शिक्षा के लिए बढ़ता शिक्षा-ऋण और अनिश्चित रोजगार बाज़ार संकेत देते हैं कि आर्थिक संकट अब सामाजिक वर्गों की पारंपरिक सीमाओं से परे फैल चुका है। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि आरक्षण और अवसरों के वितरण की बहस को भावनात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर ठोस आँकड़ों और समकालीन आर्थिक यथार्थ के आधार पर परखा जाए, ताकि सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय भी सुनिश्चित किया जा सके।

देश में यूजीसी को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है। ऐसे में गैर आरक्षित वर्ग की मौजूदा स्थिति पर चर्चा लाजिमी है। भारत में आरक्षण की बहस लंबे समय से सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक अन्याय के संदर्भ में होती रही है। सामान्य वर्ग को प्रायः एक ऐसे वर्ग के रूप में देखा गया, जो परंपरागत रूप से संपन्न, शिक्षित और अवसरों से भरपूर रहा है, इसलिए उसे किसी विशेष संरक्षण की आवश्यकता नहीं मानी गई। किंतु वर्तमान सामाजिकदृआर्थिक परिस्थितियाँ इस धारणा को गंभीर चुनौती देती हैं। आज शिक्षा की बढ़ती लागत, सीमित सरकारी नौकरियाँ, निजी क्षेत्र में अनिश्चितता और तीव्र प्रतिस्पर्धा ने सामान्य वर्ग के युवाओं को भी उसी संकट में डाल दिया है, जिससे अन्य वर्ग लंबे समय से जूझते रहे हैं। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने अपने शो में इस बात का उल्लेख किया कि वर्तमान समय में सामान्य वर्ग में बेरोज़गारी और शिक्षा-ऋण का बोझ सबसे अधिक दिखाई देता है। यह कथन केवल एक मीडिया टिप्पणी नहीं, बल्कि उपलब्ध आँकड़ों से भी काफी हद तक पुष्ट होता है।

यदि हम हाल के वर्षों के श्रम-बाजार रुझानों, विशेषकर पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे जैसे अध्ययनों को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी की समस्या सभी सामाजिक वर्गों में मौजूद है, किंतु इसकी तीव्रता सामान्य वर्ग में अपेक्षाकृत अधिक है। विभिन्न आकलनों के अनुसार सामान्य वर्ग के शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी दर औसतन 18 से 20 प्रतिशत के आसपास पाई जाती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह दर कई राज्यों में 20 प्रतिशत से भी अधिक रही है। इसके विपरीत, अनुसूचित जाति के शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी दर लगभग 14-15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति में लगभग 12-13 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग में लगभग 13-14 प्रतिशत के आसपास देखी गई है। ये आँकड़े संकेत देते हैं कि संगठित क्षेत्र और सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग के युवाओं को अपेक्षाकृत अधिक कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

इस अंतर का एक प्रमुख कारण यह है कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षित वर्गों के लिए निश्चित प्रतिशत में अवसर सुरक्षित हैं, जबकि सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी सीमित शेष सीटों के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा में शामिल होते हैं। परिणामस्वरूप, समान शैक्षणिक योग्यता और परिश्रम के बावजूद चयन की संभावना सामान्य वर्ग के लिए कम हो जाती है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के शिक्षित युवा लंबे समय तक बेरोज़गार रहते हैं या अपनी योग्यता से कम स्तर के, अस्थायी और कम वेतन वाले कार्यों को अपनाने के लिए विवश होते हैं।

बेरोज़गारी की यह समस्या तब और गंभीर रूप ले लेती है जब इसे शिक्षा-ऋण के बढ़ते बोझ से जोड़कर देखा जाए। वर्तमान समय में मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस लाखों रुपये तक पहुँच चुकी है। विभिन्न बैंकिंग और शैक्षणिक अध्ययनों के अनुसार लगभग 67 प्रतिशत सामान्य वर्ग के विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए शिक्षा-ऋण लेने को मजबूर हैं। पढ़ाई पूरी होने के बाद यदि उन्हें समय पर रोजगार नहीं मिलता, तो यह ऋण उनके लिए दीर्घकालिक आर्थिक संकट का कारण बन जाता है। इसके विपरीत, अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत अधिक छात्रवृत्तियाँ, शुल्क में छूट और सरकारी सहायता उपलब्ध होती है, जिससे उनकी शिक्षा-ऋण पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम रहती है।

इस पूरे परिदृश्य में यह धारणा कि सामान्य वर्ग सदैव आर्थिक रूप से मजबूत रहा है, आज के संदर्भ में आंशिक और अधूरी प्रतीत होती है। आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के बाद सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन आए हैं। आज सामान्य वर्ग के भीतर भी बड़ी संख्या में निम्न-मध्यम और गरीब परिवार हैं, जिनके पास न तो पर्याप्त आय है और न ही पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामान्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा और रोजगार के लिए उसी तरह संघर्ष कर रहा है, जैसे अन्य वर्गों के कमजोर तबके।

इन परिस्थितियों में आरक्षण के औचित्य पर पुनर्विचार आवश्यक प्रतीत होता है। आरक्षण का मूल उद्देश्य समान अवसर प्रदान करना है, न कि किसी वर्ग को स्थायी रूप से लाभ या वंचना की स्थिति में बनाए रखना। जब आँकड़े यह दर्शाते हैं कि सामान्य वर्ग में बेरोज़गारी दर अधिक है और शिक्षा-ऋण का बोझ भी सबसे ज्यादा है, तो केवल सामाजिक पहचान के आधार पर अवसरों का वितरण प्रश्नों के घेरे में आता है। आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है, किंतु इसकी सीमाएँ और क्रियान्वयन इसे अभी पूर्ण समाधान नहीं बना पाते।

नतीजतन, वर्गवार बेरोज़गारी के आँकड़े स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि सामान्य वर्ग आज गंभीर रोजगार संकट का सामना कर रहा है। यह स्थिति आरक्षण की बहस को भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि ठोस आँकड़ों और आर्थिक यथार्थ के आधार पर देखने की माँग करती है। सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय को भी नीति-निर्माण का आधार बनाए बिना एक संतुलित और समावेशी समाज की कल्पना अधूरी ही रहेगी।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




