



डॉ. एमपी शर्मा.
भारत जैसे लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या आज ईमानदार रहना कठिन है और बेईमान या भ्रष्ट होना कहीं ज्यादा आसान। जब-जब हम ख़बरों में करोड़ों-अरबों रुपये के घोटाले सुनते हैं, नेताओं और अधिकारियों के घर से नोटों के पहाड़ और अलमारियों से नकदी से भरे बक्से निकलते देखते हैं, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो उठता है।

ईमानदारी से जीने वाला व्यक्ति प्रायः संघर्ष करता नज़र आता है। नौकरीपेशा कर्मचारी ईमानदार रहते हुए अपने बच्चों की पढ़ाई, मकान, इलाज जैसे ज़रूरी खर्च पूरे करने में कठिनाई झेलता है। जो व्यापारी या ठेकेदार बेईमानी से बचना चाहता है, उसे प्रशासनिक तंत्र इतना तंग करता है कि वह बार-बार सोचता है क्या सही राह पर चलना मूर्खता है? ईमानदार अफसर या डॉक्टर अक्सर दबाव, बदली या झूठे आरोपों की सज़ा झेलते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘सत्य और ईमानदारी पर टिके रहना कठिन अवश्य है, पर वही मनुष्य और समाज को सच्ची ताकत देता है।’

दूसरी तरफ़ भ्रष्टाचार करने वालों की चांदी कटती दिखती है। कई नेताओं के घरों से छापों में करोड़ों रुपये निकलते हैं, नोट गिनने की मशीनें मंगवानी पड़ती हैं, कमरे नकदी से पटे रहते हैं। कुछ वर्ष पहले एक बड़े राजनेता के घर से इतनी नकदी बरामद हुई कि गिनने के लिए मशीनें कम पड़ गईं, और कमरे की दीवारें नोटों से भरकर ‘गुप्त बैंक’ बन गई थीं। हाल ही में आयकर विभाग की छापेमारी में सैकड़ों करोड़ रुपये की नकदी और सोना मिला, लेकिन आज भी इसकी जवाबदेही तय नहीं हो पाई।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, ‘यदि भ्रष्टाचार मिटाना है तो हमें तीन लोग सबसे पहले ईमानदार चाहिए। माता-पिता, शिक्षक और नेता।’ विडंबना यह है कि बेईमान लोग सत्ता और रसूख के दम पर बच निकलते हैं और ईमानदार लोग व्यवस्था में पिसते रहते हैं। ईमानदार अफसर को या तो किनारे बैठा दिया जाता है या दूरदराज़ ट्रांसफर कर दिया जाता है। जो घोटालों को उजागर करता है, उसे “व्हिसलब्लोअर” होने की सज़ा मिलती है। वहीं, जो भ्रष्ट हैं, वे महफ़िलों में सम्मानित मेहमान बनते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला दृ अनुमानित 1.76 लाख करोड़ रुपये का घोटाला, देश का पैसा कुछ ही हाथों में सिमट गया। हाल ही में, कई राज्यों में नेताओं और अधिकारियों के घर से नकदी के बोरों और सोने की ईंटों का निकलना, जिससे जनता का विश्वास हिलता है।

कई व्यापारी हज़ारों करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग गए और बैंक व जनता आज तक वसूली का इंतजार कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसका समाधान क्या है ? दरअसल, कड़े और निष्पक्ष क़ानून की जरूरत है। भ्रष्टाचार के मामलों में सख़्त सज़ा और तेज़ न्याय ज़रूरी है। समाज को ईमानदार व्यक्ति का मज़ाक उड़ाने की बजाय उसका गौरव करना चाहिए। सरकारी तंत्र और राजनीतिक फंडिंग में पूर्ण पारदर्शिता हो। बच्चों को शुरू से ही ईमानदारी का मूल्य सिखाना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ी सही रास्ते पर चले।

ईमानदार रहना कठिन है लेकिन असंभव नहीं। ईमानदार व्यक्ति भले ही धन-संपत्ति में पीछे रह जाए, पर आत्मसम्मान और समाज में विश्वास अर्जित करता है। भ्रष्ट लोग चाहे कितने भी पैसे जोड़ लें, इतिहास उन्हें कभी सम्मान नहीं देता।
सच तो यही है, ‘ईमानदारी कठिन है, पर वही चरित्र और राष्ट्र की असली पूंजी है।’
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं


