



जब मंचों पर विकसित देशों के नेता ‘भविष्य’ की चमचमाती तस्वीरें पेश करते हैं, डिजिटल क्रांति, एआई, मंगल यात्रा और ग्रीन एनर्जी की बातें करते हैं, तो यह सुनने में बेहद आधुनिक और उम्मीदों से भरा लगता है। पर क्या ये सपने उस दुनिया के लिए भी हैं, जो आज भी भूख, कुपोषण और गरीबी से कराह रही है? क्या वह ‘भविष्य’ उन बच्चों के लिए भी है, जो दो वक्त की रोटी के लिए तरसते हैं? यह सवाल केवल नैतिक नहीं है, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी का है। क्योंकि तकनीक और तरक्की की बातें तब खोखली लगती हैं, जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा भूख से मर रहा हो। यह आलेख इसी विडंबना को उजागर करता है कि कैसे ‘भविष्य की बातें’ केवल अमीरों के लिए आरक्षित हो गई हैं, और भूख आज भी वैश्विक विमर्श से गायब है।



डॉ. एमपी शर्मा.
विकसित देशों के नेता जब मंचों पर खड़े होकर ‘भविष्य’, ‘टिकाऊ विकास’, ‘ग्रीन एनर्जी’, ‘मंगल यात्रा’ और ‘डिजिटल युग’ की बातें करते हैं, तो ये सुनने में अत्यंत आकर्षक लगता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भविष्य की ये योजनाएं उन करोड़ों भूखे बच्चों के लिए भी हैं, जिन्हें आज एक वक्त का खाना भी मयस्सर नहीं? क्या भूख से बिलखते अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के बच्चों की बात करना अब गैर-ज़रूरी हो गया है? क्या यह उन विकसित देशों का दोगलापन नहीं है, जो तकनीक, सैन्य ताकत और बाजार पर तो खर्च करते हैं, लेकिन दुनिया के असली ज़ख्मों को नजरअंदाज कर देते हैं?
अमेरिका, यूरोप, जापान जैसे देश आज एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), रोबोट्स, अंतरिक्ष युद्ध, और जलवायु सम्मेलन की योजनाओं पर अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं। पर क्या आप जानते हैं कि हर 10 सेकंड में एक बच्चा कुपोषण से मर जाता है? यह डब्ल्यूएचओ का आंकड़ा है। करीब 25 करोड़ से अधिक बच्चे अभी भी कुपोषित हैं, जिनमें सबसे ज़्यादा संख्या अफ्रीका और दक्षिण एशिया की है। यूएन रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में जितना खाना बर्बाद होता है, उतना ही गरीबों को खिलाने के लिए काफी है। फिर क्यों नहीं इन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती? क्योंकि भूख कोई ‘मार्केट वैल्यू’ नहीं रखती!

विकसित देश हमें ‘ऊर्जा बचाओ’, ‘लास्टिक कम करो’, ‘कम संसाधनों में जीना सीखो’ जैसे उपदेश देते हैं। पर वे भूल जाते हैं कि भारत, बांग्लादेश, नेपाल, अफ्रीका के गाँवों में लोग पहले से ही जरूरत से कम में जी रहे हैं। एक अफ्रीकी किसान या भारतीय मजदूर की कार्बन फुटप्रिंट, अमेरिकी नागरिक की तुलना में 100 गुना कम है। फिर भी उनसे ही कहा जा रहा है, ‘बचाओ’ यह कैसा न्याय है?
क्या यह दोगलापन नहीं है? जरा गौर कीजिए। जब कोरोना वैक्सीन का वितरण हुआ तो अमीर देशों ने अपनी आबादी से 4 गुना ज़्यादा वैक्सीनें खरीद लीं। गरीब देशों को महीनों इंतजार करना पड़ा। जब तक योजनाएं बनीं, तब तक लाखों गरीब मारे जा चुके थे। अब ग्लोबल वॉर्मिंग की चर्चा पर नुकसान उद्योग और कारखाने अमीर देशों में फैले, पर वातावरण का असर सबसे ज़्यादा अफ्रीका, भारत जैसे गर्म देशों पर पड़ा। फिर भी जलवायु फंडिंग के वादे अधूरे हैं। कर्ज़ के नाम पर शोषण हो रहे हैं। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक विकासशील देशों को ‘सुधारों’ के नाम पर कर्ज़ तो देते हैं, पर उसकी शर्तें इतनी कठोर होती हैं कि गरीब देश और गरीब हो जाते हैं।

‘फ्यूचर टॉक्स’ का मतलब एक खास वर्ग का भविष्य
जब विकसित देश ‘भविष्य’ की बात करते हैं, तो वह भविष्य केवल उनके समाज के लिए होता है, जहाँ सभी के पास इंटरनेट है, स्वास्थ्य सेवा है, शिक्षा है। पर दुनिया का एक बड़ा हिस्सा आज भी अंधेरे में जी रहा है, खुले में शौच करता है, और भूखा सोता है। भविष्य की तकनीक, भूख के सवाल का जवाब नहीं दे सकती। पहले पेट भरना ज़रूरी है, फिर रोबोट और चाँद की बातें करें।
इंसानियत की साझी ज़िम्मेदारी
ग्लोबल फंडिंग का न्यायपूर्ण वितरण। भूख, शिक्षा, और स्वास्थ्य को हर वैश्विक एजेंडा में पहली प्राथमिकता दी जाए। बड़े देशों को अपने हितों से ऊपर उठकर मानवता के लिए सहयोग करना होगा। और हमें भी अपनी सरकारों से यही मांग करनी चाहिए कृ पहले भूख, फिर भविष्य।
साररू विकसित देशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर वे सच में ‘विकसित’ हैं, तो उन्हें सबसे पहले उन भूखों, बेघरों और बीमारों की चिंता करनी चाहिए जो आज भी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित हैं। भविष्य की बातें तभी उचित हैं जब आज के आँसू पोंछे जा चुके हों।
-लेखक सामाजिक व राजनीतिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




