



भटनेर पोस्ट डेस्क
होली हिंदी सिनेमा के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भावनाओं का खुला लाइसेंस रही है। जहां आम दिनों में इशारों में कही जाने वाली बातें, होली के गीतों में बिना झिझक बह निकलती हैं। परदे पर रंग उड़ते हैं, और कैमरे के पीछे रिश्तों की परतें। आइए….., होली पर बनीं पाँच प्रमुख फिल्मों और उनसे जुड़ी कुछ कम चर्चित, मगर मसालेदार इनसाइट स्टोरी पर नज़र डालें।
‘नवरंग’ की नज़ाकत
‘नवरंग’ हिंदी सिनेमा की सबसे कलात्मक होली फिल्मों में गिनी जाती है। ‘अरे जा रे हट नटखट’ गीत में रंग, राधा-कृष्ण और लोकनृत्य का ऐसा संगम था कि दर्शक दंग रह गए। निर्देशक वी. शांताराम इस फिल्म को लेकर इतने परफेक्शनिस्ट थे कि एक-एक रंग की छटा खुद तय करते थे। कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान अगर गुलाबी रंग मनचाहा न दिखे, तो पूरा सीन दोबारा होता था। यह होली गीत नहीं, एक पेंटिंग था, चलती-फिरती।
‘शोले’ की शरारत
शोले का ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ आज भी हर प्लेलिस्ट का स्थायी सदस्य है। इस गीत की शूटिंग के दौरान माहौल इतना मस्तीभरा था कि कई टेक्स बेकार गए। धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की केमिस्ट्री पर सेट में भी रंग चढ़ा हुआ था। बताया जाता है कि निर्देशक रमेश सिप्पी को डर था कि कहीं यह मस्ती कंट्रोल से बाहर न हो जाए, लेकिन वही मस्ती परदे पर शोले बन गई।
‘सिलसिला’ का सच
‘सिलसिला’ और ‘रंग बरसे’ सिर्फ गीत नहीं, सिनेमा का सबसे चर्चित अफवाह-पैकेज है। इस फिल्म की होली असल जिंदगी की होली मानी जाती है। अमिताभ बच्चन, रेखा और जया बच्चन, तीनों का एक फ्रेम में होना अपने-आप में गॉसिप था। कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान माहौल असहज रहता था, मगर कैमरा ऑन होते ही सब प्रोफेशनल। होली के रंगों ने वह कह दिया, जो संवाद नहीं कह सके।
‘कटी पतंग’ का कटाक्ष
कटी पतंग का ‘आज न छोड़ेंगे’ होली के बहाने छेड़छाड़ और भावनात्मक खिंचाव का गीत है। राजेश खन्ना और आशा पारेख के बीच उस समय रिश्ते सहज नहीं थे, लेकिन कैमरे के सामने सब रंगीन। यह वही दौर था जब सुपरस्टार की मुस्कान भी स्क्रिप्ट का हिस्सा मानी जाती थी। होली यहां प्रेम से ज्यादा अधिकार का प्रतीक बन गई।
‘बाग़बान’ का भावुक रंग
‘बाग़बान’ की होली ‘होली खेले रघुवीरा’ ने बुजुर्ग प्रेम को उत्सव में बदल दिया। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी ने इस गीत को उम्र के खिलाफ बयान की तरह लिया। शूटिंग के दौरान दोनों ने कहा था कि यह होली जवानी की नहीं, रिश्तों की है। शायद इसलिए यह गीत घर-घर में गूंजा।
इन पाँच फिल्मों की होली हमें सिखाती है कि रंग सिर्फ चेहरे पर नहीं, कहानियों में भी चढ़ते हैं। कहीं शरारत है, कहीं सच्चाई, कहीं अफवाह और कहीं आत्मस्वीकृति। हिंदी सिनेमा में होली हमेशा से दिल की बात कहने का सबसे सुरक्षित बहाना रही है और कहानी का सबसे भरोसेमंद रंग।





