





एमएल शर्मा.
2 नवंबर यानी रविवार की रात एक ऐसा इतिहास रचा गया, जिसकी गूंज समूचे विश्व में सुनाई दे रही है। हिंद की बेटियों ने महिला क्रिकेट विश्वकप के फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को करारी शिकस्त देकर वर्ल्ड कप पहली बार अपने नाम किया। भारतीय शेरनियां जमकर दहाड़ी और लीजिए जनाब, ‘दुनियां हमारी मुट्ठी में।’

तारीख 25 जून 1983 और 2 नवंबर 2025 दोनों इतिहास बन गई। फासला 42 साल का, लेकिन असर कमोबेश एक जैसा। दो तारीखें, दो वर्ल्ड कप, दो कप्तान और भारतीय क्रिकेट को दो बार नई पहचान। सबसे पहले 25 जून 1983, जब कपिल देव ने दुनिया को चौंकाया था। लॉर्ड्स का मैदान, वर्ल्डकप का फाइनल और सामने दो बार की चौंपियन वेस्टइंडीज। कोई भी भारत पर दांव लगाने को तैयार नहीं था। टीम को ‘टूरिस्ट स्क्वॉड’ कहा गया। लेकिन कपिल देव की टीम ने इतिहास पलट दिया। 43 रन से जीत हासिल कर पहली बार वर्ल्ड कप भारत आया।

गौर कीजिए, वह जीत महज एक ट्रॉफी नहीं थी बल्कि उस दिन से भारतीय क्रिकेट प्रबंधन, बीसीसीआई की ताकत, फैन कल्चर, खेल की अर्थव्यवस्था सब कुछ बदल गया। फिर आगे चलकर 2007, 2011, 2024 में भी ‘जय हिंद’ की ललकार के साथ वर्ल्ड कप आए। परन्तु, 1983 वह बीज था, जिसपर आज भारत के क्रिकेट साम्राज्य की इमारत खड़ी है।

2 नवंबर 2025, नवी मुंबई में जब हरमनप्रीत कौर ने 42 साल बाद वही कहानी दोहराई तो करोड़ों दिल झूम उठे। नवी मुंबई के डी.वाई. पाटिल स्टेडियम में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वो कर दिखाया, जो अब तक सिर्फ़ सपनों में था। पहली बार भारत ने महिला एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप जीता। ये जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, ये लाखों बेटियों के सपनों को नई दिशा देने वाली जीत है। अब पैरेंट्स बेटियों को क्रिकेटर बनाना ‘ख्वाब’ नहीं, ‘कैरियर’ समझेंगे।

फाइनल मैच ‘आँकड़ों’ में नहीं, ‘असर’ में याद रखा जाएगा। भारत ने पहले बैटिंग करते हुए 50 ओवर में 7 विकेट पर 298 रन बनाए। टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने वाली इंडियन टीम ने स्मृति मंधाना व शेफाली वर्मा की 104 रन की ओपनिंग साझेदारी से मजबूत पहल दी। शेफाली का 78 गेंदों पर 87 रन का तूफानी खेल। दीप्ति शर्मा 58, रिचा घोष 34, जेमिमा 24, कप्तान हरमनप्रीत 20 ने ताबड़तोड़ खेल दिखाया।

जवाब में दक्षिण अफ्रीका टीम 246 पर सिमट गई। भारत 52 रन से विजेता बना। दक्षिण अफ्रीका की कप्तान लौरा वोलवॉर्ड ने 101 रन जरूर बनाए, लेकिन भारतीय टीम का जुनून, फील्डिंग और गेंदबाजी उनके शतक पर भारी पड़ा। दीप्ति शर्मा ने 39 रन देकर 5 विकेट लिए, साथ ही अपने तेजतर्रार सटीक थ्रो से एक खिलाड़ी को रन आउट भी किया। प्रतिका रावल के चोटिल होने के बाद ‘वाइल्ड कार्ड एंट्री’ शेफाली वर्मा ने बल्ले से 87 रन बनाए साथ ही गेंद से 2 विकेट हासिल कर हरफनमौला खेल दिखाया।

अमनजोत का रन आउट व लौरा का कैच पकड़ना गेम ‘टर्निंग पॉइंट’ बना। दीप्ति शर्मा को ‘प्लेयर ऑफ द फाइनल’ चुना गया।
इस टीम की असली धरोहर क्या है? यह जीत केवल 15 खिलाड़ियों की नहीं, यह भारत की स्पोर्ट्स कल्चर में बदलाव की शुरुआत है।

टीम के योद्धा हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, शेफाली वर्मा, दीप्ति शर्मा, जेमिमा रोड्रिग्स, ऋचा घोष, रेणुका ठाकुर, राधा यादव, अमनजोत कौर, नल्श्रीलापुरेडी, श्री चरणी, स्नेह राणा, उमा छेत्री, अरुंधति रेड्डी, हरलीन देओल, प्रतिका रावल सबके जोश, जज्बे, अथक परिश्रम का सुफल आखिरकार मिल ही गया। हेड कोच अमोल मजूमदार को सेल्यूट है, जिन्हें कभी भारतीय पुरुष टीम की जर्सी नसीब नहीं हुई, मगर उन्होंने अपनी कोचिंग से टीम इंडिया को महिला विश्व चौंपियन बना दिया। 1983 ने पुरुष क्रिकेट को नया युग दिया वहीं 2025 महिलाओं के क्रिकेट का स्वतंत्रता दिवस है। अब यह जीत सिर्फ़ खेल नहीं, एक सांस्कृतिक बदलाव है। अब भारतीय बेटियां सिर्फ खेलेंगी नहीं,जीतेंगी भी।

देव दिवाली से दो दिन पहले ही हिन्दुस्तान जगमगा गया है। हालांकि, महिला क्रिकेट विश्वकप का सफर इतना सहज नहीं था पर संघर्ष के बल पर सपनों की उड़ान को हकीकत की मंजिल मयस्सर हो गई। म्हारी छोरियां, जिनके लिए जीत कोई ष्विकल्पष् नहीं बल्कि ‘परंपरा’ है। वाह! दिल से सेल्यूट बेटियों।


