




गोपाल झा.
हनुमानगढ़, जो कभी राजनीतिक और प्रशासनिक तालमेल का मिसाल माना जाता था, इन दिनों एक अलग ही ‘गर्मी’ से तप रहा है। यह गर्मी केवल मौसम की नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल की अंदरूनी राजनीति की भी है, जो अब खुलकर चिंगारियां छोड़ने लगी है। ताज़ा विवाद, बिजली महकमे के एईएन और बीजेपी के पूर्व जिलाध्यक्ष के बीच सिर्फ एक विभागीय घटना नहीं, बल्कि उस गहरी खाई का संकेत है, जो सत्ता और सेवा के बीच बन चुकी है।
गर्मी का मौसम हमेशा से बिजली महकमे के लिए परीक्षा का समय रहा है। लेकिन छह से आठ नहीं, 13 घंटे की कटौती, और उस पर शिकायत करने पर जवाब न मिलना, जनता के लिए ‘कोढ़ में खाज’ जैसा अनुभव है। यहाँ सवाल केवल तारों में बहने वाली बिजली का नहीं है, बल्कि उस ‘संवेदनशीलता’ का है, जो जनता के साथ संवाद में होनी चाहिए। जब कोई अधिकारी अपनी जिम्मेदारी के स्थान पर अहंकार को रख देता है, तो हर बातचीत टकराव में बदल जाती है।

यह प्रवृत्ति नई नहीं है। जिले में कई ऐसे ‘सत्ताकेन्द्र’ बन चुके हैं, जिनके इर्द-गिर्द अधिकारी और कर्मचारी अपने पद की डोर बांध चुके हैं। किसी खास नेता के संरक्षण में वे खुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगते हैं। जनता और दूसरे जनप्रतिनिधि उनके लिए मानो महज़ व्यवधान हों, जिन्हें कभी रूखे शब्दों में टाल देना और कभी पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देना ‘सामान्य व्यवहार’ बन जाता है।

सच यह है कि जनता से जुड़े विभागों में वर्कलोड बढ़ा है। लम्बी ड्यूटी, तकनीकी दिक्कतें, और संसाधनों की कमी, ये सब कर्मचारियों को थका देते हैं। लेकिन थकान असभ्यता का बहाना नहीं बन सकती। ‘सेवक’ का अर्थ ही अनुशासन और सेवा भाव है। अगर आप न तो जनता को सुविधा दे पा रहे हैं, और न ही उनकी नाराज़गी का सामना करने का साहस रखते हैं, तो नौकरी का औचित्य ही संदिग्ध हो जाता है।

ताज़ा प्रकरण में, जब संबंधित अधिकारी ने अपनी गलती मान ली, तो मामला सुलझ जाना चाहिए था। लेकिन यूनियनबाज़ी के नाम पर धरना देना यह दर्शाता है कि उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन है। यह भूल खतरनाक है कि किसी यूनियन में भले सैकड़ों या हज़ारों सदस्य हों, लेकिन जनता तो लाखों में है। जब जनाक्रोश एकजुट हो जाए तो कोई यूनियन, कोई पद और कोई राजनीतिक छत्रछाया उसे रोक सकती है क्या ? जनता की अहमियत का अहसास तो रहना ही चाहिए। भीड़ को भी नियंत्रित रहने की जरूरत थी। किसी नेता विशेष का पोस्टर फाड़ना अशोभनीय है। इस तरह की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए सबको ध्यान रखने की जरूरत है। यह हनुमानगढ की साफ सुथरी राजनीति के खिलाफ है।

हनुमानगढ़ का इतिहास बताता है कि यहाँ संवाद और सहयोग की परंपरा रही है। जब बिजली कटती थी, तो अधिकारी विनम्रता से कारण बताते थे, और जनता धैर्य रखती थी। कभी-कभी जनता या जनप्रतिनिधि आवेश में आ जाते, तो उसे भी ‘काम का हिस्सा’ मानकर सह लिया जाता था। लेकिन नई पीढ़ी के कई अधिकारी-कर्मचारी इस धैर्य की परीक्षा में ‘फेल’ हो रहे हैं। वे जल्द ‘उखड़’ जाते हैं, और ‘वरदहस्त’ पाकर यह भूल जाते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं है, आज का किला कल ढह सकता है।
दूसरी ओर, बीजेपी का ‘डबल इंजन’ नारा यहाँ ठिठका हुआ दिखता है। दोनों इंजन अलग-अलग दिशा में खींचते नजर आ रहे हैं, और प्रशासनिक मशीनरी राजनीतिक नेतृत्व से आगे निकलकर हावी हो चुकी है। जनता के लिए यह स्थिति निराशाजनक है,उसे लगता है कि वह न केवल सेवाओं से वंचित है, बल्कि सम्मान से भी।

अगर बीजेपी ने अपने आंतरिक मतभेद और प्रशासनिक अव्यवस्था को ठीक करने की कोशिश नहीं की, तो यह विवाद आने वाले चुनावों में बड़ा नुकसान दे सकता है। क्योंकि जनता केवल बिजली का ‘स्विच’ ही नहीं बदलती, ‘सत्ता का स्विच’ भी पलट देती है, और एक बार वह कनेक्शन कट गया, तो उसे दोबारा जोड़ना कठिन हो जाता है।
असल में, हनुमानगढ़ को आज जरूरत है उस ‘रोशनी’ की, जो केवल बल्ब से नहीं, भरोसे से आती है। यह रोशनी तब जलेगी जब अधिकारी सेवा भाव से, कर्मचारी अनुशासन से, और नेता समन्वय से काम करेंगे। वरना चाहे करंट बिजली का हो या सियासत का, दोनों ही जनता को झटका देने से बाज़ नहीं आएंगे।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं


